रविवार, 28 अक्टूबर 2012

क़त्‍ल के बाद


गि‍लास भर पानी की तरह 
पी जाता हूँ अपनी नींद को 

आँखें जैसे खाली गि‍लास 

देखता हूँ, एक कमरे की 
रोशनी से बाहर का अँधेरा 

दूर-दूर तक अँधेरा 

अँधेरे में सोया हे जग सारा 
खोया-खोया-सा 
अपने सुख-चैन में 
मुग्‍ध-तृप्‍त 

भीतर टटोलता हूँ अपने
 कुछ मि‍लता नहीं ! 
कमरा भर रोशनी के क़त्‍ल के बाद 
अपने भीतर 
पाता हूँ बहुत-सी चीज़ें
अँधेरे में साफ़-साफ़ 
                                            -2001 ई0 

        ०००००

रविवार, 21 अक्टूबर 2012

आँधि‍याँ


जहाँ  दो  पल  बैठा  करते  हम-तुम, 
उन दरख्‍़तों को उड़ा ले गई आँधि‍याँ। 

छुआ करते जि‍न बुलंदि‍यों से आसमाँ, 
उन  परबतों  को उड़ा ले गई आँधि‍याँ। 

महक-महक  उठते  जो  ख़ुशबू  से, 
उन  खतों को उड़ा ले गई आँधि‍याँ। 

सि‍लवट से जि‍नकी भरा होता बि‍छौना, 
उन  करवटों  को  उड़ा ले गई आँधि‍याँ। 

जुटाती    ताक़त    जो    लड़ने    की, 
उन हसरतों को उड़ा ले गई आँधि‍याँ। 

पुख्‍़ता  और  भी जि‍नसे होती उम्‍मीदें, 
उन तोहमतों को उड़ा ले गई आँधि‍याँ। 
                                                           -1995 ई0
                 ००००००

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

लम्‍हों की रवि‍श


देखना,  तुम 
अब छूटा के तब छूटा 
         - तीर / लगेगा ऐसा ....और 
तनी हुई प्रत्‍यंचा की 
          टूट जाएगी 
      डोर --- साँसों की 


और ... देखना 
शीशे - सी पि‍घलती 
बर्फ - सी घुलती 
रि‍स - रि‍स कर बहती 
क़ त रा - क़ त रा 
छुटती - छटपटाती 
आखि‍र,  आख़ि‍री तक 
टूटती - फूटती - दरकती 
            लम्‍हों की रवि‍श 


    दहशत में चाँद 
    भटका करेगा रात - रात भर 
    जगमग - जगमग जगमगाकर जुगनू 
    बाँट चुके होंगे अपने हि‍स्‍से की रोशनी, 
    लटका रहेगा रात का कंबल काला 
    रंगों की ओट सो चुकी होंगी कि‍रणें 
    मछलि‍याँ तैरेंगी हवा में 
    जल अटकेगा कंठ में फाँस की तरह 
    टूटे तारे - सा छि‍टक जाएगा आँख से 
                                        एक आँसू 
    नि‍वीड़ एकांत अंतरि‍क्ष में 
    वह दीप्‍त आभा रह जाएगी 
                                                     -2000 ई0 

            *********** 

शनिवार, 29 सितंबर 2012

जि‍ओ हज़ारों साल

चि‍. अन्‍वय क्षीरसागर 

           जन्‍मदि‍न की हार्दि‍क बधाई व शुभकामनाएँ ! 






                     जिओ मेरे लाल 

    
                              जीवेत् शरद: शतम्  ********************

बुधवार, 26 सितंबर 2012

जैसे ईश्‍वर


जैसे ईश्‍वर 
नि‍हारता है धरती को 
फि‍र करता है उर्वर परती को 
वह रचता है एक कि‍सान में मेहनत का जज्‍बा 
और भेज देता है गौएँ चरने के लि‍ए 
पूरी फ़सल चाट कर 
गौमाताएँ करती हैं जुगाली 

फि‍र वही जज्‍बा 
काम करता है 
फि‍र जोतता है खेत, कि‍सान 
गौमाताओं की संतानों को फाँदकर 
कोचकता है तुतारी उनके पुष्‍ट पुट्ठों पर 
अपना पुश्‍तैनी गुस्‍सा नि‍कालते हुए 

मुसकराता है ईश्‍वर 
अपनी रचनात्‍मक ज़िद पर 
और रचता है फि‍र 
                                           2001 

      **********

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

आते हैं आने वाले...


ये दुनि‍या है
आते हैं आनेवाले
जाते हैं जानेवाले,

सेतु नहीं है
फिर भी
इस पार से उस पार तक
उस पार से इस पार तक

 आते हैं आने वाले......

                                   1997
     *******

रविवार, 9 सितंबर 2012

उफनती नदी के ख्‍़वाब में


उफनती नदी के ख्‍़वाब में
आती हैं
कभी, तटासीन आबाद बस्‍ति‍याँ
तो कभी
तीर्थों के गगनचुंबी कलस और
तरूवरों की लम्‍बी क़तारें
लेकि‍न
जब-जब भी उमड़ पड़ा है उफान
तैरकर बचती नि‍कल आई हैं बस्‍ति‍याँ।
वहाँ के बासिंदों की फ़ि‍तरत में
शामि‍ल होता रहा है गहरे पानी का कटाक्ष
वे पार करते रहे हैं कई-कई सैलाब
अपने हौसलों के आर-पार

जब-जब भी झाँकती है नदी
अपनी हद से बाहर
नि‍कलकर दूर जा बसते रहे हैं देवता
और लौटते रहे हैं तीर्थयात्रि‍यों के संग-संग
वापस अपने धाम तक
भक्‍तों की प्रार्थना सुनने के लि‍ए।
बाँचते रहे हैं शंख और घड़ि‍याल
दीन-दुखि‍यों की अर्जि‍याँ

जब-जब भी कगारों को
टटोलती है जलजिह्वा
नि‍हत्‍थी समर्पि‍त होती रही हैं जड़ें
जंगल के जंगल बहते गए
फि‍र भी बीज उगाते रहे हैं
क़तारों पे क़तारें फि‍र से
दो क़दम पीछे ही सही
फि‍र से खड़ी होती रही हैं
तरूवरों की संतानें

  **********


शनिवार, 1 सितंबर 2012

तलघर


मछलि‍याँ नहीं रहती थीं। 
वहाँ हाड़-माँस के 
जीते-जागते मानुस 
खदेड़ दि‍ए जाते थे। 
अँधेरी गुफाओं में 
रोशनी और हवा तक 
को मनाही थी आने की। 
सख्‍त पहरे में 
फ़क़त कोड़ों की फटकार 
और कुछ भारी-भरकम 
पैरों की आवाज़ सुनाई पड़ती थी 

आत्‍माओं - सी भटकती 
यातनाएँ 
झपट पड़ती थीं 
और बलात् प्रवेश कर जाती थीं काया में।
यातनाएँ पिघलती थीं बंदियों की शिराओं में 
बहती थीं लहू के साथ 
फूटकर कि‍सी नासूर की 
शक्‍ल अख्तियार करते हुए घाव से।
देह सि‍हरने डरा करती थी और 
डर-डर कर सि‍हर जाती थी 
एक अजब सड़ांध - सी फैली 
होती थी आसपास जो 
प्राणवायु का कि‍रदार अदा करती हुई 
घुलती थी ऊपर -नीचे 
होते हुए सीने के भीतर 
चेहरे के कि‍सी सुराख से 

*           *          *           * 

मछलि‍याँ नहीं छि‍पायी जाती थीं 
सचमुच के 
बड़े-बड़े ख़ज़ाने होते थे 
ति‍लस्‍मी गहराइयों में 
रंग बदलकर मटमैले 
होते थे रत्‍न-जवाहरात 
बड़े ही रहस्‍यमय होते थे ख़ज़ाने 
और इनमें छि‍पा होता था रहस्‍य 
जय-पराजय का  
लूटने और लुट जाने का 

तलघर के अंतस्‍तल में 
निर्वस्‍त्र होता था आलमगीर 
क़ैद होते थे शाही ज़िंदगी के सारे रहस्‍य 
यहीं कि‍सी ख़ाने में 
क़ैद होती थीं सुंदरियाँ 
क़ैद होते थे ग़ुलाम और 
क़ैद होती थी कोई ललकार 
ज़ि‍द्दी, लड़ाकू और ज़हीन हस्‍ति‍यों के साथ 
यहाँ तक कि कभी-कभी 
साज़ि‍शी करामातों के तहत 
जहाँपनाह भी 
जहाँ से बचने के लि‍ए लेते थे पनाह यहाँ 

  *            *             *             * 

कभी तो 
मरी हुई मछलि‍याँ 
पानी की तलाश में नि‍कलेंगी 
भूगर्भ से, 
अपने इति‍हास से बेख़बर 
कोई न कोई पुश्‍त खोदेगी खाई 
अपनी बुनि‍याद के लि‍ए 
जब नहीं टकराएँगी अस्‍थियाँ उनके औज़ारों से 
वे गहराई तक जाएँगे धरती के सन्‍नाटे में, 
पाताल तक पहुँचते-पहुँचते 
उन्‍हें सुनार्इ देंगी तलघर में दफ़न सि‍सकि‍याँ 
अंतरि‍क्ष की सुरक्षि‍त ध्‍वनि‍यों में 
तब, वे उजागर करेंगे तलघर का इति‍हास 
और षड्यंत्र की सभ्‍यता को 

       ************ 


रविवार, 26 अगस्त 2012

क्‍यूँ पुकारना ?


क्‍यूँ पुकारना
              ना
ना यूँ
      पुकार - ना

सुनता नहीं जब कोई
         क्‍यूँ पुकारना ?

         *****

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

वि‍कल्‍प


कल
दुनि‍या के बीज मि‍लेंगे
अभी तो व्‍यस्‍त हैं
दुनि‍या के नाश के आवि‍श्‍कारक

वि‍कल्‍प
जब भी कोई
मि‍ल जाएगा पृथ्‍वी का
नष्‍ट कर दी जाएगी दुनि‍या

जि‍सका जी नहीं लगता
कल का इंतज़ार करें
इंतज़ार करे पृथ्‍वी के नष्‍ट होने तक

मुकम्‍मल सोच ले तरकीब
बीजों को हथि‍याने की,
सूँघ ले सारे ठि‍काने
जहाँ, हो सकता है दस्‍तावेज
पृथ्‍वी के वि‍कल्‍प का

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रविवार, 24 जून 2012

लहर थाह लेती है


लहर-बहर 
एक लहर 
लहर सागर की । 
सागर अथाह 
अथाह जलराशि 

'लहर ठहर ज़रा,' 
पुकार-पुकार हारेंगे 

लहर कभी रूकती है क्‍या ! 

लहर 
थाह लेती है सागर की 

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रविवार, 27 मई 2012

अभि‍नय की तरह

छद्म हमें अपनी दुनि‍या में अकेला 
वि‍वश करता है 
                   होने के लि‍ए । 

हम तड़पते हैं और चीख़ नहीं पाते !
कोई भी कर सकता है हमारी मदद 
पर,  हम,  पु का र ते   नहीं !
आतंकि‍त होकर भी आतंकि‍त नहीं होते 
चलते हैं दौड़ने की तरह 
दौड़ते हैं चलने की तरह 

आसपास की चीज़ों को  
शक्‍की की तरह नि‍हारते हैं 
'संदि‍ग्‍ध चीज़ों में वि‍स्‍फोट का ख़तरा है' 
ख़तरे बहुत से हैं 
ख़तरों से बचने के उपाय बहुत से हैं 
बहुत से हैं भय 
                भय से बच सकते हैं 
         पर, बचते नहीं हैं 
                ख़तरों से बच सकते हैं 
          पर बचते नहीं हैं 
                बचकर भी भागते हैं तो बच नहीं पाते 
जैसे-तैसे 
           जी लेते हैं _ अभि‍नय की तरह

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बुधवार, 11 अप्रैल 2012

फि‍र


थकान के बि‍स्‍तर पर बेसुध नींद 
मूर्छा की हद तक 
कभी-कभी मौत की तरह 
बेहद शांत और थि‍र 
                       फि‍र 
एक चुटकी सुबह की 
और मुसकाती धूप 
            पुचकारती नई लंबी यात्रा के लिए 
                  बहलाती-सी कि‍सी बच्‍चे की तरह 
समझा चुकी होती पूरी तरह एक नया काम 

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रविवार, 26 फ़रवरी 2012

रागरंग


राजा था
बेलबुटों की बुनावट से सजा-धजा महल था
रुत थी मौसम था
वाहवाही थी
साथ-साथ राजा के वाहवाह करनेवालों की


साज थे
फि‍ज़ा में ढलती मौसि‍की थी
गान था
अपनी लय में चढती-उतरती तान थी
नृत्‍य था
अपनी तमाम मुद्राओं में मृदुल नुपूर-नाद लि‍ए


राजा के फ़रमान से
सजी तो थी महफ़ि‍ल मगर
साजिंदें नहीं थे
गायक नहीं था
नर्तकी नहीं थी


कला के पाखंडी उत्‍सव में
उपस्‍थि‍त नहीं थीं उनकी आत्‍माएं
वे तो उनके बुत थे
जि‍न पर अटकी हुई थीं सबकी आंखें

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बुधवार, 4 जनवरी 2012

नश्‍शा गर्म साँसों का...... !


ये क्‍या अजब बेचैनी है
बेजा रफ़्तार है रग़ों में लहू की
सांसें हैं धौंकनी
पिघलता-सा कुछ उतर रहा है आंखों में
बडी बे-कल  हैं आजकल की घडि‍यां
ये कौन आनेवाला है......
है कि‍सका इंतज़ार ?
............................ !


जैसे पूरब से पि‍घलकर
धरती पर बह आया हो सोना
सब का सब सुनहला-सा
पि‍घला-पि‍घला-सा
कुछ धुँधला कुछ उजला-उजला


कहीं जो झपट पडी हवा
तो गि‍री खलि‍हान से धान की कुछ बालि‍यां
और जाने कहां मि‍ल गई पि‍घलती सुनहली आभा में


इस घास-फूस और पुआल में
जाने कौन गर्मी छि‍पी है
जो महका-महकाकर
गुलाबी करती हैं गर्म सांसों को
चुभती है केवल हवा
हां वही हवा डंक मारकर
सि‍हरती हुई चली जाती है।


उनकी रफ़्तार में शामि‍ल
होता है गर्म सांसों का धुआ
जो उठता है चारों ओर
और ढँक जाता है सारा उजाला
जि‍न्‍हें दि‍खता है वे भी कहां
देख पाते हैं
जो देख पाते हैं वे समझ नहीं
पाते
समझे हुओं को अपने दि‍न
याद आते हैं
जि‍नकी यादों में उतर आती
पुआल की गर्मी
उनकी गर्म सांसों में उतर
आता है एक ख़याल


महज एक ख़याल समझकर
उतरने देते हैं नश्‍शा गर्म सांसों का
कि‍ दि‍न सबके हैं
जब जि‍सके हो तब उसके हो

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शनिवार, 5 नवंबर 2011

आदमी का बच्‍चा, सबब और भय का अंधा समय

आदमी का बच्‍चा 

आदमी का बच्‍चा
नहीं भर सकता कुलॉंचें
रँभाती गायों के
नवजात बछड़ों की तरह

अभि‍शप्‍त है वह
पैदा होते ही रोने को

        *****


सबब 

आज़ाद औरतें जानती हैं
कि
वाक़ई कि‍तनी आज़ाद हैं वे

वे जानती हैं अपने जि‍स्‍म और रूह के दरमि‍यान
भटकते-फटकते  शरारती फौवारें

उन्‍हें मालूम है उनके तन और मन के बीच
आज़ादी की कि‍तनी पतली धार है

फासलों की बात अगर छोड भी दें तो
वे जानती हैं बातों के छूट जाने का सबब

                *****


भय का अंधा समय  

भय का अंधा समय
धर्म की लाठी लेकर
पार करना चाहता है
नि‍रपेक्ष रास्‍तों को

वैधानि‍क चेतावनी के बावजूद
नशे में धुत्‍त हो जाता है एक नागरि‍क
राजस्‍व प्राप्‍त कर ख़ुश है प्रशासन
नशा मुक्‍ति‍ अभि‍यान के लि‍ए
पर्याप्‍त धन पाकर ख़ुश हैं स्‍वयंसेवी संगठन

साधु-संत, पुजारी और धर्मानुयायी
पूजा-अर्चना और प्रार्थना से कारगर मानते रहे हैं
जलसा-जुलूस और आंदोलन को

अराजकता और आतंक के अनुबंध
मुँहमॉंगी कीमत पर तय हो रहे हैं
रक़म अदायगी का अनुशासन है

                  *****


रविवार, 9 अक्टूबर 2011

बंद दराज़ से कुछ............आधी-अधूरी दो कवि‍ताऍं

( 1 )

चिंताओं की जड़ें 

जाने कहॉं से आती हैं बातें 
जो अक्‍सर जगाती हैं रात-रात भर 

रात-रात भर खॉंसती है बुढ़ि‍या 
अपने सुनहरे अतीत को याद करती हुई 
कोसती है कॉंटों की तरह चुभती हवा को 
भला-बुरा कहती है रात की कालि‍ख को 

सुबकती है अपनी जुगल जोड़ी के बि‍छोह में 

ख़ुद अपने हाथों से पैर दबाती हुई 
थपथपाती है अपनी आत्‍मा को शांति‍ के लि‍ए 

खोजती है अँधेरे में बेबात की चिंताओं की जड़ें 

                     *****  

( 2 ) 

बस यही होता रहा 

बैठ जाना लोगों के बीच 
और रह जाना चुप 
आसान है या मुश्‍कि‍ल 
यही तय नहीं हो सका अब तक 

लोगों से कहता रहा लोगों की बातें 
लोग सुनाते रहे अपना हाल 
हॉं-हूँ करते हुए 
सलाह मशवि‍रा तक होता रहा 

फ़ायदा लेनेवाले फलते-फुलते रहे 
मौके-बेमौके बुलाते रहे 
घड़ी-दो-घड़ी को साथ बैठने के लि‍ए 
कहते रहे अपनी बात 
सुनना कुछ और देखना कहीं 
बस  यही  होता रहा 

       *****

शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

यादों के कारखाने...


पुराने दि‍न इतने पुराने हैं 
कि‍ यादों के कारखाने हैं 

जाने क्‍या-क्‍या हैं यहाँ

बे-सि‍र-पैर के हज़ारों क़ि‍स्‍से 
बे-पर की उड़ाने 
गुमशुदा दोस्‍ती की महक 
बदग़ुमानी का मजा 
अनचाहे प्‍यार की सजा 
अचानक मि‍ली ख़ुशि‍यों की गुदगुदी 
ख़ुद ही ख़ुद में बेख़ुदी 

और तो और 
बेहुदगी की बेहद हदें 
बेतुकी बातों की ज़दे 

      *******

रविवार, 17 अप्रैल 2011

एक हाइकू....

तपती रेत
दि‍न भर हँसती 
धूप समेत

       *

बुधवार, 23 मार्च 2011

आख्‍यान : समापन कि‍स्‍त

इट वाज़ ए रि‍व्वोल्‍यूशनरी जजमेंट.............................................. 

                  कुजूर जि‍सका जीवन लखनपुर के गोयल सेठ के पास गि‍रवी है। उसे दो जुन का दाल-चावल मयस्‍सर है किंतु उसके संगी-साथी, उसके अपने लोग भूखे-लॉंगे हैं। उसे उनकी भूख उद्वेलि‍त करती है। उनकी भूख और पीड़ा का उसे अपने साथि‍यों के साथ अनाज गोदाम लूटने को वि‍वश करता है किंतु लूट के बाद भागते हुए सभी पकड़ा जाते हैं। सारे ज़माखोर सतर्क हो जाते हैं, तथाकथि‍त सभ्‍य समाज की ऑंखों से भी यह घटना गुज़रती  है किंतु कुजूर और उसके साथि‍यों का इस आरोप को मान लेना, क़ुबूल कर लेना न्‍यायाधीश को एक अभूतपूर्व फ़ैसले की ओर ले जाता है। अलकुजूर और उसके साथि‍यों को सि‍र्फ़ एक दि‍न के सादे कारावास की सज़ा दी जाती है और गोयल सेठ व अन्‍य जमाखोरों को फटकारकर उनके ख़ि‍लाफ़ जमाखोरी के ज़ुर्म में क़ानूनी कार्रवाई हेतु ज़ि‍ला प्रशासन को हि‍दायत दी जाती है। जेम्‍स इस नि‍र्णय से गहरे प्रभावि‍त होता है, तभी तो वह सोचता है,.......'इट इज़ ए रि‍वोल्‍यूशनरी जजमेंट',  इस फ़ैसले के ज़रि‍ये जेम्‍स आत्‍ममंथन करता है कि‍ जि‍स ईसाई मि‍शनरीज़ ने हमें उत्‍पीड़न, असंवेदन और शोषण से उबरने में समर्थ कि‍या है वही यदि‍ हमें अपनी वि‍चारधारा और जीवनशैली थोपकर हमारा शोषण करें तो यह स्‍वीकार्य नहीं है....... ''क्‍योंकि‍ जो हमें एक तरह के शोषण से मुक्‍त कराता है। जब वह ख़ुद हमारा शोषण करने लगता है तो उसके अंदर का 'सेंस ऑफ़ गि‍ल्‍ट'  भी ख़त्‍म हो जाता है। यह बात और ख़तरनाक होती है,'' ( पृ0 109 ) जेम्‍स के चरि‍त्र का रूपांतरण यहॉं स्‍पष्‍ट देखा जा सकता है। नि‍स्‍संदेह कि‍सी का पोसना इसलि‍ए ज़रूरी नहीं कि‍ पोषि‍त ही बाद में पोषण का काम करे।

एक ख़ूबसुरत मछली.......राग-रव........खाखा पक्षी की चहक.................

                            मनुष्‍य की रागात्‍मकता मि‍ट नहीं सकती। आस्‍था, धर्म, कर्मकांड, साधना, वि‍श्‍वास, वि‍चारधारा, रीति‍-रि‍वाज, धर्म-संस्‍कृति‍ या जीवनशैली का कोई भी आवरण उसे ढँक तो सकता है किंतु नष्‍ट नहीं कर सकता। जेम्‍स और सोज़ेलि‍न के मध्‍य उपस्‍थि‍त राग में एक दैवीय आकर्षण है जो उन्‍हें परस्‍पर खींचता-बॉंधता और मुक्‍त करता है। चेन्‍द्रा घाट के पास घास पर लेटा जेम्‍स और उसके सामने बैठी सोज़ेलि‍न, उनके मध्‍य का मौन और फि‍र चेंद्रा में प्रवाहि‍त जल के स्‍पर्श से मुखर होता मौन उन्‍हें पूर्णत: अनुरक्‍त कर देता है-उन्‍हें एक कर देता है। दृष्‍टव्‍य है जेम्‍स का आभास......''उसे लगा कि‍ गाजर घास उत्‍तम देश की  बढ़ि‍या फ़सल है। उसके आसपास बड़े-बड़े पत्‍थर थे जो सुंदर  ग़लीचों की तरह लग रहे थे। मि‍ट्टी की चादरें थीं, कोसे पानी का  बहता झरना था, दूर-दूर तक नरम घास थी , गाजर घास के बीच लाल गाजर की कल्‍पना थी। सब कुछ था।  वह था, सोज़ेलि‍न थी। पर कुछ नहीं था, क्‍योंकि‍ बहुत कुछ ऐसा था जो उनके लि‍ए वर्जि‍त था।  क्‍यों वर्जि‍त था,वे नहीं जानते थे (पृ0 112 ) प्रेम के संसार में वर्जना और भय चुपके से प्रवि‍ष्‍ट होते हैं, भय का रि‍श्‍ता क़ायम होता है छल- प्रपंच और साज़ि‍शें पलती हैं किंतु स्‍वप्‍न सबको धूमि‍ल कर देता है। अनुरक्‍त जेम्‍स देखता है अपने भीतर झॉंककर ...एक काला पक्षी...खाखा, जो बेहद सुंदर ,स्‍फूर्त और बेहद सक्रि‍य व चंचल है। उसे सोज़ेलि‍न मिंज एक ख़ूबसुरत मछली की तरह दि‍खायी पड़ती है। यही वह क्षण है प्रेम का जि‍समें मन की सारी गॉंठें खुल जाती हैं। अनुरक्‍त सोज़ेलि‍न अपनी नींद में मुक्‍त होती है, भय के रि‍श्‍ते से वह जान जाती है राग-रव  वह सुन लेती है खाखा पक्षी की चहक !

उम्‍मीदों की ज़मीं...............मुट्ठि‍यों में एक अमूर्त भय, ...............पलायन 


                       जेम्‍स खाखा  सन ऑफ़ अलेक्‍ज़ेंडर खाखा  आज रोम जाने के लि‍ए चुना गया है किंतु वह असहज है, वह तय नहीं कर पा रहा है कि‍ यह उसके आनंद का क्षण है या नहीं ! तीन साल तक वह  अपनी ज़मीन से दूर -सोज़ेलि‍न से दूर रहेगा। सोज़ेलि‍न उसे अपनी ओर खींच रही है। सि‍स्‍टर अनास्‍तसि‍या और मॉं के चेहरे उसके सामने उपस्‍थि‍त हो रहे हैं। रोम जाने के लि‍ए जेम्‍स का चयन उसके जीवन की 'ग्रेट अपार्चुनि‍टी' है किंतु और भी बातें हैं जहॉं जेम्‍स का मन  अटका हुआ है। जेम्‍स समझ नहीं पा रहा है कि‍ 'क्‍या यही उसके उम्‍मीदों की ज़मीं है ? फि‍र उम्‍मीद भी केवल उसकी नहीं है। अब वह अकेला कहॉं है। अक्‍सर वि‍चारशील जेम्‍स के सम्‍मुख अब अनुरक्‍त जेम्‍स आ खड़ा होता है। वि‍चारों में खोया हुआ जेम्‍स बाज़ार से वि‍चरता है, जहॉं तरह-तरह की चीज़ें हैं ये चीज़ें आदि‍म ज़द से मुक्‍त होना चाहती हैं। वह देखता है कि‍ हाट अब बाज़ार में तब्‍दील हो गया है और बाज़ार जो वि‍ज्ञापन का मुरीद है, धीरे-धीरे सब कुछ खा रहा है। टेलीवि‍ज़न के पर्दे पर हाट की सारी चीज़ें बाज़ार के वि‍ज्ञापन में शामि‍ल होकर सरगुजा के कलेक्‍टर और उसकी पत्‍नी को सरप्राइज़ करेंगी। यहॉं जेम्‍स के उम्‍मीदों की ज़मीं सरकती है, संस्‍कृति‍ के बाजारू होने की एक टीस उठती है। जेम्‍स की भावुकता और सोच की तीव्रता में तेजिंदर जि‍स आख्‍यान को रचते हैं उसकी भाषा श्‍लाघ्‍य है......''उसने अपनी मुट्ठि‍यों में एक अमूर्त भय को छि‍पा रखा था जि‍से वह कि‍सी पक्षी की तरह बि‍शपस्‍वामी के कमरे में छोड़ देना चाहता था।'' ( पृ0 120 ) जेम्‍स के लि‍ए यह कहना उसके चरि‍त्र को तर्कसंगत करना है, ऐसा लगता है जैसे तेजिंदर आख्‍यान के भीतर कवि‍ता रचते हैं। ''उसके मन के अंदर एक चीता है जो दौड़ता रहता है, एक तेज़ तर्रार चोंच और बड़े-बड़े पंखों वाला पक्षी है जो आसमान में उड़ता रहता है।'' ( पृ0 120 ) ऐसे कथन जहॉं तेजिंदर की उपलब्‍धि‍ है वहीं जेम्‍स के चरि‍त्र के उन्‍नायक । जेम्‍स के मानस में बराबर उथल-पुथल बनी रहती है। उसका आत्‍मबोध बार-बार उसे वि‍वश करता है, रोम तक जाना उसे  पलायन लगता है जबकि‍ जेम्‍स परि‍स्‍थि‍ति‍यों से दूर भागने से बचता रहता है।

जेम्‍स बि‍शपस्‍वामी के भीतर के दुष्‍ट व्‍यक्‍ति‍ को जान लेता है। बि‍शप जो कभी राजा की तरह होता है तो कभी एक कुशल व वाकपटु राजनीति‍ज्ञ की तरह । वह जेम्‍स के द्वारा भूख की दलीलों को नहीं मानता वह जेम्‍स से साफ़-साफ़ कह देता है....... ''हमें अपनी स्‍ट्रेटेजीबहुत सोच समझकर तय करनी होगी  कि‍ कहीं हमारी सेवा या प्रार्थना का लाभ कॉंग्रेस या  आर. एस. एस. को न मि‍ल जाये,'' ( पृ0 123 ) यह उसकी राजनैति‍क दूरदृष्‍टि‍ है, यही दृष्‍टि‍  धर्मप्रांत में प्रार्थना और सेवा के राजनैति‍क महत्‍व को उजागर करती है । यहॉं  नि‍स्‍वार्थ धर्मभाव महज एक छल है । वह जेम्‍स के सच और दलि‍त संघर्ष को एक सपना और दुनि‍या के इस महालोकतंत्र को बाज़ार कहता है किंतु  जेम्‍स का प्रति‍रोध भी खुलकर सामने आता है वह बि‍शप से स्‍पष्‍ट कह देता है कि‍.... '' सपनो के इस  बाज़ार पर आपका अधि‍कार ख़त्‍म हो रहा है।'' (पृ0 124 ) बि‍शप के चेहरे  पर  एक क्रूर जमींदार का चेहरा उतर आता है जो अपने बंधुआ मज़दूर के चेहरे पर वि‍द्रोह की रेखाऍं पढ़ लेता है। बि‍शप एक शोषक है और जेम्‍स शोषि‍त।  बि‍शपस्‍वामी जेम्‍स के आत्‍मबोध, अतीत के प्रति‍ लगाव और अंत: परि‍वर्तन को बूझ लेता है इसलि‍ए उन दोनो में एक नई तरह की ज़ि‍रह होती है। जेम्‍स खाखा की छटपटाहट जंगल में व्‍याप्‍त समाज की छटपटाहट, एक-एक आदि‍वासी की भूख उसे सताती है तभी तो वह बीशपस्‍वामीसे यह सवाल करता है,...... ''भूख हमेशा दलि‍त या आदि‍वासी ही क्‍यों होती है ? " ( पृ0 123 ) जेम्‍स का यह आवेश स्‍वाभावि‍क है जो धर्म के छद्म को खोल देता है, साम्राज्‍यवादी व्‍यूह को तोड़ देता है।

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