शनिवार, 29 सितंबर 2012
बुधवार, 26 सितंबर 2012
जैसे ईश्वर
जैसे ईश्वर
निहारता है धरती को
फिर करता है उर्वर परती को
वह रचता है एक किसान में मेहनत का जज्बा
और भेज देता है गौएँ चरने के लिए
पूरी फ़सल चाट कर
गौमाताएँ करती हैं जुगाली
फिर वही जज्बा
काम करता है
फिर जोतता है खेत, किसान
गौमाताओं की संतानों को फाँदकर
कोचकता है तुतारी उनके पुष्ट पुट्ठों पर
अपना पुश्तैनी गुस्सा निकालते हुए
मुसकराता है ईश्वर
अपनी रचनात्मक ज़िद पर
और रचता है फिर
2001
**********
लेबल
जैसे ईश्वर,
मेरी कविताएँ
मंगलवार, 18 सितंबर 2012
आते हैं आने वाले...
ये दुनिया है
आते हैं आनेवाले
जाते हैं जानेवाले,
सेतु नहीं है
फिर भी
इस पार से उस पार तक
उस पार से इस पार तक
आते हैं आने वाले......
1997
*******
रविवार, 9 सितंबर 2012
उफनती नदी के ख़्वाब में
उफनती नदी के ख़्वाब में
आती हैं
कभी, तटासीन आबाद बस्तियाँ
तो कभी
तीर्थों के गगनचुंबी कलस और
तरूवरों की लम्बी क़तारें
लेकिन
जब-जब भी उमड़ पड़ा है उफान
तैरकर बचती निकल आई हैं बस्तियाँ।
वहाँ के बासिंदों की फ़ितरत में
शामिल होता रहा है गहरे पानी का कटाक्ष
वे पार करते रहे हैं कई-कई सैलाब
अपने हौसलों के आर-पार
जब-जब भी झाँकती है नदी
अपनी हद से बाहर
निकलकर दूर जा बसते रहे हैं देवता
और लौटते रहे हैं तीर्थयात्रियों के संग-संग
वापस अपने धाम तक
भक्तों की प्रार्थना सुनने के लिए।
बाँचते रहे हैं शंख और घड़ियाल
दीन-दुखियों की अर्जियाँ
जब-जब भी कगारों को
टटोलती है जलजिह्वा
निहत्थी समर्पित होती रही हैं जड़ें
जंगल के जंगल बहते गए
फिर भी बीज उगाते रहे हैं
क़तारों पे क़तारें फिर से
दो क़दम पीछे ही सही
फिर से खड़ी होती रही हैं
तरूवरों की संतानें
**********
शनिवार, 1 सितंबर 2012
तलघर
मछलियाँ नहीं रहती थीं।
वहाँ हाड़-माँस के
जीते-जागते मानुस
खदेड़ दिए जाते थे।
अँधेरी गुफाओं में
रोशनी और हवा तक
को मनाही थी आने की।
सख्त पहरे में
फ़क़त कोड़ों की फटकार
और कुछ भारी-भरकम
पैरों की आवाज़ सुनाई पड़ती थी
आत्माओं - सी भटकती
यातनाएँ
झपट पड़ती थीं
और बलात् प्रवेश कर जाती थीं काया में।
यातनाएँ पिघलती थीं बंदियों की शिराओं में
बहती थीं लहू के साथ
फूटकर किसी नासूर की
शक्ल अख्तियार करते हुए घाव से।
देह सिहरने डरा करती थी और
डर-डर कर सिहर जाती थी
एक अजब सड़ांध - सी फैली
होती थी आसपास जो
प्राणवायु का किरदार अदा करती हुई
घुलती थी ऊपर -नीचे
होते हुए सीने के भीतर
चेहरे के किसी सुराख से
* * * *
मछलियाँ नहीं छिपायी जाती थीं
सचमुच के
बड़े-बड़े ख़ज़ाने होते थे
तिलस्मी गहराइयों में
रंग बदलकर मटमैले
होते थे रत्न-जवाहरात
बड़े ही रहस्यमय होते थे ख़ज़ाने
और इनमें छिपा होता था रहस्य
जय-पराजय का
लूटने और लुट जाने का
तलघर के अंतस्तल में
निर्वस्त्र होता था आलमगीर
क़ैद होते थे शाही ज़िंदगी के सारे रहस्य
यहीं किसी ख़ाने में
क़ैद होती थीं सुंदरियाँ
क़ैद होते थे ग़ुलाम और
क़ैद होती थी कोई ललकार
ज़िद्दी, लड़ाकू और ज़हीन हस्तियों के साथ
यहाँ तक कि कभी-कभी
साज़िशी करामातों के तहत
जहाँपनाह भी
जहाँ से बचने के लिए लेते थे पनाह यहाँ
* * * *
कभी तो
मरी हुई मछलियाँ
पानी की तलाश में निकलेंगी
भूगर्भ से,
अपने इतिहास से बेख़बर
कोई न कोई पुश्त खोदेगी खाई
अपनी बुनियाद के लिए
जब नहीं टकराएँगी अस्थियाँ उनके औज़ारों से
वे गहराई तक जाएँगे धरती के सन्नाटे में,
पाताल तक पहुँचते-पहुँचते
उन्हें सुनार्इ देंगी तलघर में दफ़न सिसकियाँ
अंतरिक्ष की सुरक्षित ध्वनियों में
तब, वे उजागर करेंगे तलघर का इतिहास
और षड्यंत्र की सभ्यता को
************
लेबल
तलघर,
मेरी कविताएँ
रविवार, 26 अगस्त 2012
क्यूँ पुकारना ?
क्यूँ पुकारना
ना
ना यूँ
पुकार - ना
सुनता नहीं जब कोई
क्यूँ पुकारना ?
*****
लेबल
क्यूँ पुकारना ?,
मेरी कविताएँ
मंगलवार, 21 अगस्त 2012
विकल्प
कल
दुनिया के बीज मिलेंगे
अभी तो व्यस्त हैं
दुनिया के नाश के आविश्कारक
विकल्प
जब भी कोई
मिल जाएगा पृथ्वी का
नष्ट कर दी जाएगी दुनिया
जिसका जी नहीं लगता
कल का इंतज़ार करें
इंतज़ार करे पृथ्वी के नष्ट होने तक
मुकम्मल सोच ले तरकीब
बीजों को हथियाने की,
सूँघ ले सारे ठिकाने
जहाँ, हो सकता है दस्तावेज
पृथ्वी के विकल्प का
******
लेबल
मेरी कविताएँ,
विकल्प
रविवार, 24 जून 2012
लहर थाह लेती है
लहर-बहर
एक लहर
लहर सागर की ।
सागर अथाह
अथाह जलराशि
'लहर ठहर ज़रा,'
पुकार-पुकार हारेंगे
लहर कभी रूकती है क्या !
लहर
थाह लेती है सागर की
*********
लेबल
मेरी कविताएँ,
लहर थाह लेती है
रविवार, 27 मई 2012
अभिनय की तरह
छद्म हमें अपनी दुनिया में अकेला
विवश करता है
होने के लिए ।
हम तड़पते हैं और चीख़ नहीं पाते !
कोई भी कर सकता है हमारी मदद
पर, हम, पु का र ते नहीं
!
आतंकित होकर भी आतंकित नहीं होते
चलते हैं दौड़ने की तरह
दौड़ते हैं चलने की तरह
आसपास की चीज़ों को
शक्की की तरह निहारते हैं
'संदिग्ध चीज़ों में विस्फोट का ख़तरा है'
ख़तरे बहुत से हैं
ख़तरों से बचने के उपाय बहुत से हैं
बहुत से हैं भय
भय से बच सकते हैं
पर, बचते नहीं हैं
ख़तरों से बच सकते हैं
पर बचते नहीं हैं
बचकर भी भागते हैं तो बच नहीं पाते
जैसे-तैसे
जी लेते हैं _ अभिनय की तरह
**************
**************
लेबल
अभिनय की तरह,
मेरी कविताएँ
बुधवार, 11 अप्रैल 2012
फिर
थकान के बिस्तर पर बेसुध नींद
मूर्छा की हद तक
कभी-कभी मौत की तरह
बेहद शांत और थिर
फिर
एक चुटकी सुबह की
और मुसकाती धूप
पुचकारती नई लंबी यात्रा के लिए
बहलाती-सी किसी बच्चे की तरह
समझा चुकी होती पूरी तरह एक नया काम
********
लेबल
फिर,
मेरी कविताएँ
रविवार, 26 फ़रवरी 2012
रागरंग
राजा था
बेलबुटों की बुनावट से सजा-धजा महल था
रुत थी मौसम था
वाहवाही थी
साथ-साथ राजा के वाहवाह करनेवालों की
साज थे
फिज़ा में ढलती मौसिकी थी
गान था
अपनी लय में चढती-उतरती तान थी
नृत्य था
अपनी तमाम मुद्राओं में मृदुल नुपूर-नाद लिए
राजा के फ़रमान से
सजी तो थी महफ़िल मगर
साजिंदें नहीं थे
गायक नहीं था
नर्तकी नहीं थी
कला के पाखंडी उत्सव में
उपस्थित नहीं थीं उनकी आत्माएं
वे तो उनके बुत थे
जिन पर अटकी हुई थीं सबकी आंखें
***********
लेबल
मेरी कविताएँ,
रागरंग
बुधवार, 4 जनवरी 2012
नश्शा गर्म साँसों का...... !
ये क्या अजब बेचैनी है
बेजा रफ़्तार है रग़ों में लहू की
सांसें हैं धौंकनी
पिघलता-सा कुछ उतर रहा है आंखों में
बडी बे-कल हैं आजकल की घडियां
ये कौन आनेवाला है......
है किसका इंतज़ार ?
............................ !
जैसे पूरब से पिघलकर
धरती पर बह आया हो सोना
सब का सब सुनहला-सा
पिघला-पिघला-सा
कुछ धुँधला कुछ उजला-उजला
कहीं जो झपट पडी हवा
तो गिरी खलिहान से धान की कुछ बालियां
और जाने कहां मिल गई पिघलती सुनहली आभा में
इस घास-फूस और पुआल में
जाने कौन गर्मी छिपी है
जो महका-महकाकर
गुलाबी करती हैं गर्म सांसों को
चुभती है केवल हवा
हां वही हवा डंक मारकर
सिहरती हुई चली जाती है।
उनकी रफ़्तार में शामिल
होता है गर्म सांसों का धुआ
जो उठता है चारों ओर
और ढँक जाता है सारा उजाला
जिन्हें दिखता है वे भी कहां
देख पाते हैं
जो देख पाते हैं वे समझ नहीं
पाते
समझे हुओं को अपने दिन
याद आते हैं
जिनकी यादों में उतर आती
पुआल की गर्मी
उनकी गर्म सांसों में उतर
आता है एक ख़याल
महज एक ख़याल समझकर
उतरने देते हैं नश्शा गर्म सांसों का
कि दिन सबके हैं
जब जिसके हो तब उसके हो
*************
शनिवार, 5 नवंबर 2011
आदमी का बच्चा, सबब और भय का अंधा समय
आदमी का बच्चा
आदमी का बच्चा
नहीं भर सकता कुलॉंचें
रँभाती गायों के
नवजात बछड़ों की तरह
अभिशप्त है वह
पैदा होते ही रोने को
*****
सबब
आज़ाद औरतें जानती हैं
कि
वाक़ई कितनी आज़ाद हैं वे
वे जानती हैं अपने जिस्म और रूह के दरमियान
भटकते-फटकते शरारती फौवारें
उन्हें मालूम है उनके तन और मन के बीच
आज़ादी की कितनी पतली धार है
फासलों की बात अगर छोड भी दें तो
वे जानती हैं बातों के छूट जाने का सबब
*****
भय का अंधा समय
भय का अंधा समय
धर्म की लाठी लेकर
पार करना चाहता है
निरपेक्ष रास्तों को
वैधानिक चेतावनी के बावजूद
नशे में धुत्त हो जाता है एक नागरिक
राजस्व प्राप्त कर ख़ुश है प्रशासन
नशा मुक्ति अभियान के लिए
पर्याप्त धन पाकर ख़ुश हैं स्वयंसेवी संगठन
साधु-संत, पुजारी और धर्मानुयायी
पूजा-अर्चना और प्रार्थना से कारगर मानते रहे हैं
जलसा-जुलूस और आंदोलन को
अराजकता और आतंक के अनुबंध
मुँहमॉंगी कीमत पर तय हो रहे हैं
रक़म अदायगी का अनुशासन है
*****
आदमी का बच्चा
नहीं भर सकता कुलॉंचें
रँभाती गायों के
नवजात बछड़ों की तरह
अभिशप्त है वह
पैदा होते ही रोने को
*****
सबब
आज़ाद औरतें जानती हैं
कि
वाक़ई कितनी आज़ाद हैं वे
वे जानती हैं अपने जिस्म और रूह के दरमियान
भटकते-फटकते शरारती फौवारें
उन्हें मालूम है उनके तन और मन के बीच
आज़ादी की कितनी पतली धार है
फासलों की बात अगर छोड भी दें तो
वे जानती हैं बातों के छूट जाने का सबब
*****
भय का अंधा समय
भय का अंधा समय
धर्म की लाठी लेकर
पार करना चाहता है
निरपेक्ष रास्तों को
वैधानिक चेतावनी के बावजूद
नशे में धुत्त हो जाता है एक नागरिक
राजस्व प्राप्त कर ख़ुश है प्रशासन
नशा मुक्ति अभियान के लिए
पर्याप्त धन पाकर ख़ुश हैं स्वयंसेवी संगठन
साधु-संत, पुजारी और धर्मानुयायी
पूजा-अर्चना और प्रार्थना से कारगर मानते रहे हैं
जलसा-जुलूस और आंदोलन को
अराजकता और आतंक के अनुबंध
मुँहमॉंगी कीमत पर तय हो रहे हैं
रक़म अदायगी का अनुशासन है
*****
लेबल
आदमी का बच्चा,
भय का अंधा समय,
मेरी कविताएँ,
सबब
रविवार, 9 अक्टूबर 2011
बंद दराज़ से कुछ............आधी-अधूरी दो कविताऍं
( 1 )
चिंताओं की जड़ें
जाने कहॉं से आती हैं बातें
जो अक्सर जगाती हैं रात-रात भर
रात-रात भर खॉंसती है बुढ़िया
अपने सुनहरे अतीत को याद करती हुई
कोसती है कॉंटों की तरह चुभती हवा को
भला-बुरा कहती है रात की कालिख को
सुबकती है अपनी जुगल जोड़ी के बिछोह में
ख़ुद अपने हाथों से पैर दबाती हुई
थपथपाती है अपनी आत्मा को शांति के लिए
खोजती है अँधेरे में बेबात की चिंताओं की जड़ें
*****
( 2 )
बस यही होता रहा
बैठ जाना लोगों के बीच
और रह जाना चुप
आसान है या मुश्किल
यही तय नहीं हो सका अब तक
लोगों से कहता रहा लोगों की बातें
लोग सुनाते रहे अपना हाल
हॉं-हूँ करते हुए
सलाह मशविरा तक होता रहा
फ़ायदा लेनेवाले फलते-फुलते रहे
मौके-बेमौके बुलाते रहे
घड़ी-दो-घड़ी को साथ बैठने के लिए
कहते रहे अपनी बात
सुनना कुछ और देखना कहीं
बस यही होता रहा
*****
शुक्रवार, 30 सितंबर 2011
यादों के कारखाने...
पुराने दिन इतने पुराने हैं
कि यादों के कारखाने हैं
जाने क्या-क्या हैं यहाँ
बे-सिर-पैर के हज़ारों क़िस्से
बे-पर की उड़ाने
गुमशुदा दोस्ती की महक
बदग़ुमानी का मजा
अनचाहे प्यार की सजा
अचानक मिली ख़ुशियों की गुदगुदी
ख़ुद ही ख़ुद में बेख़ुदी
और तो और
बेहुदगी की बेहद हदें
बेतुकी बातों की ज़दे
*******
रविवार, 17 अप्रैल 2011
बुधवार, 23 मार्च 2011
आख्यान : समापन किस्त
इट वाज़ ए रिव्वोल्यूशनरी जजमेंट..............................................
कुजूर जिसका जीवन लखनपुर के गोयल सेठ के पास गिरवी है। उसे दो जुन का दाल-चावल मयस्सर है किंतु उसके संगी-साथी, उसके अपने लोग भूखे-लॉंगे हैं। उसे उनकी भूख उद्वेलित करती है। उनकी भूख और पीड़ा का उसे अपने साथियों के साथ अनाज गोदाम लूटने को विवश करता है किंतु लूट के बाद भागते हुए सभी पकड़ा जाते हैं। सारे ज़माखोर सतर्क हो जाते हैं, तथाकथित सभ्य समाज की ऑंखों से भी यह घटना गुज़रती है किंतु कुजूर और उसके साथियों का इस आरोप को मान लेना, क़ुबूल कर लेना न्यायाधीश को एक अभूतपूर्व फ़ैसले की ओर ले जाता है। अलकुजूर और उसके साथियों को सिर्फ़ एक दिन के सादे कारावास की सज़ा दी जाती है और गोयल सेठ व अन्य जमाखोरों को फटकारकर उनके ख़िलाफ़ जमाखोरी के ज़ुर्म में क़ानूनी कार्रवाई हेतु ज़िला प्रशासन को हिदायत दी जाती है। जेम्स इस निर्णय से गहरे प्रभावित होता है, तभी तो वह सोचता है,.......'इट इज़ ए रिवोल्यूशनरी जजमेंट', इस फ़ैसले के ज़रिये जेम्स आत्ममंथन करता है कि जिस ईसाई मिशनरीज़ ने हमें उत्पीड़न, असंवेदन और शोषण से उबरने में समर्थ किया है वही यदि हमें अपनी विचारधारा और जीवनशैली थोपकर हमारा शोषण करें तो यह स्वीकार्य नहीं है....... ''क्योंकि जो हमें एक तरह के शोषण से मुक्त कराता है। जब वह ख़ुद हमारा शोषण करने लगता है तो उसके अंदर का 'सेंस ऑफ़ गिल्ट' भी ख़त्म हो जाता है। यह बात और ख़तरनाक होती है,'' ( पृ0 109 ) जेम्स के चरित्र का रूपांतरण यहॉं स्पष्ट देखा जा सकता है। निस्संदेह किसी का पोसना इसलिए ज़रूरी नहीं कि पोषित ही बाद में पोषण का काम करे।
एक ख़ूबसुरत मछली.......राग-रव........खाखा पक्षी की चहक.................
मनुष्य की रागात्मकता मिट नहीं सकती। आस्था, धर्म, कर्मकांड, साधना, विश्वास, विचारधारा, रीति-रिवाज, धर्म-संस्कृति या जीवनशैली का कोई भी आवरण उसे ढँक तो सकता है किंतु नष्ट नहीं कर सकता। जेम्स और सोज़ेलिन के मध्य उपस्थित राग में एक दैवीय आकर्षण है जो उन्हें परस्पर खींचता-बॉंधता और मुक्त करता है। चेन्द्रा घाट के पास घास पर लेटा जेम्स और उसके सामने बैठी सोज़ेलिन, उनके मध्य का मौन और फिर चेंद्रा में प्रवाहित जल के स्पर्श से मुखर होता मौन उन्हें पूर्णत: अनुरक्त कर देता है-उन्हें एक कर देता है। दृष्टव्य है जेम्स का आभास......''उसे लगा कि गाजर घास उत्तम देश की बढ़िया फ़सल है। उसके आसपास बड़े-बड़े पत्थर थे जो सुंदर ग़लीचों की तरह लग रहे थे। मिट्टी की चादरें थीं, कोसे पानी का बहता झरना था, दूर-दूर तक नरम घास थी , गाजर घास के बीच लाल गाजर की कल्पना थी। सब कुछ था। वह था, सोज़ेलिन थी। पर कुछ नहीं था, क्योंकि बहुत कुछ ऐसा था जो उनके लिए वर्जित था। क्यों वर्जित था,वे नहीं जानते थे (पृ0 112 ) प्रेम के संसार में वर्जना और भय चुपके से प्रविष्ट होते हैं, भय का रिश्ता क़ायम होता है छल- प्रपंच और साज़िशें पलती हैं किंतु स्वप्न सबको धूमिल कर देता है। अनुरक्त जेम्स देखता है अपने भीतर झॉंककर ...एक काला पक्षी...खाखा, जो बेहद सुंदर ,स्फूर्त और बेहद सक्रिय व चंचल है। उसे सोज़ेलिन मिंज एक ख़ूबसुरत मछली की तरह दिखायी पड़ती है। यही वह क्षण है प्रेम का जिसमें मन की सारी गॉंठें खुल जाती हैं। अनुरक्त सोज़ेलिन अपनी नींद में मुक्त होती है, भय के रिश्ते से वह जान जाती है राग-रव वह सुन लेती है खाखा पक्षी की चहक !
उम्मीदों की ज़मीं...............मुट्ठियों में एक अमूर्त भय, ...............पलायन
जेम्स खाखा सन ऑफ़ अलेक्ज़ेंडर खाखा आज रोम जाने के लिए चुना गया है किंतु वह असहज है, वह तय नहीं कर पा रहा है कि यह उसके आनंद का क्षण है या नहीं ! तीन साल तक वह अपनी ज़मीन से दूर -सोज़ेलिन से दूर रहेगा। सोज़ेलिन उसे अपनी ओर खींच रही है। सिस्टर अनास्तसिया और मॉं के चेहरे उसके सामने उपस्थित हो रहे हैं। रोम जाने के लिए जेम्स का चयन उसके जीवन की 'ग्रेट अपार्चुनिटी' है किंतु और भी बातें हैं जहॉं जेम्स का मन अटका हुआ है। जेम्स समझ नहीं पा रहा है कि 'क्या यही उसके उम्मीदों की ज़मीं है ? फिर उम्मीद भी केवल उसकी नहीं है। अब वह अकेला कहॉं है। अक्सर विचारशील जेम्स के सम्मुख अब अनुरक्त जेम्स आ खड़ा होता है। विचारों में खोया हुआ जेम्स बाज़ार से विचरता है, जहॉं तरह-तरह की चीज़ें हैं ये चीज़ें आदिम ज़द से मुक्त होना चाहती हैं। वह देखता है कि हाट अब बाज़ार में तब्दील हो गया है और बाज़ार जो विज्ञापन का मुरीद है, धीरे-धीरे सब कुछ खा रहा है। टेलीविज़न के पर्दे पर हाट की सारी चीज़ें बाज़ार के विज्ञापन में शामिल होकर सरगुजा के कलेक्टर और उसकी पत्नी को सरप्राइज़ करेंगी। यहॉं जेम्स के उम्मीदों की ज़मीं सरकती है, संस्कृति के बाजारू होने की एक टीस उठती है। जेम्स की भावुकता और सोच की तीव्रता में तेजिंदर जिस आख्यान को रचते हैं उसकी भाषा श्लाघ्य है......''उसने अपनी मुट्ठियों में एक अमूर्त भय को छिपा रखा था जिसे वह किसी पक्षी की तरह बिशपस्वामी के कमरे में छोड़ देना चाहता था।'' ( पृ0 120 ) जेम्स के लिए यह कहना उसके चरित्र को तर्कसंगत करना है, ऐसा लगता है जैसे तेजिंदर आख्यान के भीतर कविता रचते हैं। ''उसके मन के अंदर एक चीता है जो दौड़ता रहता है, एक तेज़ तर्रार चोंच और बड़े-बड़े पंखों वाला पक्षी है जो आसमान में उड़ता रहता है।'' ( पृ0 120 ) ऐसे कथन जहॉं तेजिंदर की उपलब्धि है वहीं जेम्स के चरित्र के उन्नायक । जेम्स के मानस में बराबर उथल-पुथल बनी रहती है। उसका आत्मबोध बार-बार उसे विवश करता है, रोम तक जाना उसे पलायन लगता है जबकि जेम्स परिस्थितियों से दूर भागने से बचता रहता है।
जेम्स बिशपस्वामी के भीतर के दुष्ट व्यक्ति को जान लेता है। बिशप जो कभी राजा की तरह होता है तो कभी एक कुशल व वाकपटु राजनीतिज्ञ की तरह । वह जेम्स के द्वारा भूख की दलीलों को नहीं मानता वह जेम्स से साफ़-साफ़ कह देता है....... ''हमें अपनी स्ट्रेटेजीबहुत सोच समझकर तय करनी होगी कि कहीं हमारी सेवा या प्रार्थना का लाभ कॉंग्रेस या आर. एस. एस. को न मिल जाये,'' ( पृ0 123 ) यह उसकी राजनैतिक दूरदृष्टि है, यही दृष्टि धर्मप्रांत में प्रार्थना और सेवा के राजनैतिक महत्व को उजागर करती है । यहॉं निस्वार्थ धर्मभाव महज एक छल है । वह जेम्स के सच और दलित संघर्ष को एक सपना और दुनिया के इस महालोकतंत्र को बाज़ार कहता है किंतु जेम्स का प्रतिरोध भी खुलकर सामने आता है वह बिशप से स्पष्ट कह देता है कि.... '' सपनो के इस बाज़ार पर आपका अधिकार ख़त्म हो रहा है।'' (पृ0 124 ) बिशप के चेहरे पर एक क्रूर जमींदार का चेहरा उतर आता है जो अपने बंधुआ मज़दूर के चेहरे पर विद्रोह की रेखाऍं पढ़ लेता है। बिशप एक शोषक है और जेम्स शोषित। बिशपस्वामी जेम्स के आत्मबोध, अतीत के प्रति लगाव और अंत: परिवर्तन को बूझ लेता है इसलिए उन दोनो में एक नई तरह की ज़िरह होती है। जेम्स खाखा की छटपटाहट जंगल में व्याप्त समाज की छटपटाहट, एक-एक आदिवासी की भूख उसे सताती है तभी तो वह बीशपस्वामीसे यह सवाल करता है,...... ''भूख हमेशा दलित या आदिवासी ही क्यों होती है ? " ( पृ0 123 ) जेम्स का यह आवेश स्वाभाविक है जो धर्म के छद्म को खोल देता है, साम्राज्यवादी व्यूह को तोड़ देता है।
*******************
एक ख़ूबसुरत मछली.......राग-रव........खाखा पक्षी की चहक.................
मनुष्य की रागात्मकता मिट नहीं सकती। आस्था, धर्म, कर्मकांड, साधना, विश्वास, विचारधारा, रीति-रिवाज, धर्म-संस्कृति या जीवनशैली का कोई भी आवरण उसे ढँक तो सकता है किंतु नष्ट नहीं कर सकता। जेम्स और सोज़ेलिन के मध्य उपस्थित राग में एक दैवीय आकर्षण है जो उन्हें परस्पर खींचता-बॉंधता और मुक्त करता है। चेन्द्रा घाट के पास घास पर लेटा जेम्स और उसके सामने बैठी सोज़ेलिन, उनके मध्य का मौन और फिर चेंद्रा में प्रवाहित जल के स्पर्श से मुखर होता मौन उन्हें पूर्णत: अनुरक्त कर देता है-उन्हें एक कर देता है। दृष्टव्य है जेम्स का आभास......''उसे लगा कि गाजर घास उत्तम देश की बढ़िया फ़सल है। उसके आसपास बड़े-बड़े पत्थर थे जो सुंदर ग़लीचों की तरह लग रहे थे। मिट्टी की चादरें थीं, कोसे पानी का बहता झरना था, दूर-दूर तक नरम घास थी , गाजर घास के बीच लाल गाजर की कल्पना थी। सब कुछ था। वह था, सोज़ेलिन थी। पर कुछ नहीं था, क्योंकि बहुत कुछ ऐसा था जो उनके लिए वर्जित था। क्यों वर्जित था,वे नहीं जानते थे (पृ0 112 ) प्रेम के संसार में वर्जना और भय चुपके से प्रविष्ट होते हैं, भय का रिश्ता क़ायम होता है छल- प्रपंच और साज़िशें पलती हैं किंतु स्वप्न सबको धूमिल कर देता है। अनुरक्त जेम्स देखता है अपने भीतर झॉंककर ...एक काला पक्षी...खाखा, जो बेहद सुंदर ,स्फूर्त और बेहद सक्रिय व चंचल है। उसे सोज़ेलिन मिंज एक ख़ूबसुरत मछली की तरह दिखायी पड़ती है। यही वह क्षण है प्रेम का जिसमें मन की सारी गॉंठें खुल जाती हैं। अनुरक्त सोज़ेलिन अपनी नींद में मुक्त होती है, भय के रिश्ते से वह जान जाती है राग-रव वह सुन लेती है खाखा पक्षी की चहक !
उम्मीदों की ज़मीं...............मुट्ठियों में एक अमूर्त भय, ...............पलायन
जेम्स खाखा सन ऑफ़ अलेक्ज़ेंडर खाखा आज रोम जाने के लिए चुना गया है किंतु वह असहज है, वह तय नहीं कर पा रहा है कि यह उसके आनंद का क्षण है या नहीं ! तीन साल तक वह अपनी ज़मीन से दूर -सोज़ेलिन से दूर रहेगा। सोज़ेलिन उसे अपनी ओर खींच रही है। सिस्टर अनास्तसिया और मॉं के चेहरे उसके सामने उपस्थित हो रहे हैं। रोम जाने के लिए जेम्स का चयन उसके जीवन की 'ग्रेट अपार्चुनिटी' है किंतु और भी बातें हैं जहॉं जेम्स का मन अटका हुआ है। जेम्स समझ नहीं पा रहा है कि 'क्या यही उसके उम्मीदों की ज़मीं है ? फिर उम्मीद भी केवल उसकी नहीं है। अब वह अकेला कहॉं है। अक्सर विचारशील जेम्स के सम्मुख अब अनुरक्त जेम्स आ खड़ा होता है। विचारों में खोया हुआ जेम्स बाज़ार से विचरता है, जहॉं तरह-तरह की चीज़ें हैं ये चीज़ें आदिम ज़द से मुक्त होना चाहती हैं। वह देखता है कि हाट अब बाज़ार में तब्दील हो गया है और बाज़ार जो विज्ञापन का मुरीद है, धीरे-धीरे सब कुछ खा रहा है। टेलीविज़न के पर्दे पर हाट की सारी चीज़ें बाज़ार के विज्ञापन में शामिल होकर सरगुजा के कलेक्टर और उसकी पत्नी को सरप्राइज़ करेंगी। यहॉं जेम्स के उम्मीदों की ज़मीं सरकती है, संस्कृति के बाजारू होने की एक टीस उठती है। जेम्स की भावुकता और सोच की तीव्रता में तेजिंदर जिस आख्यान को रचते हैं उसकी भाषा श्लाघ्य है......''उसने अपनी मुट्ठियों में एक अमूर्त भय को छिपा रखा था जिसे वह किसी पक्षी की तरह बिशपस्वामी के कमरे में छोड़ देना चाहता था।'' ( पृ0 120 ) जेम्स के लिए यह कहना उसके चरित्र को तर्कसंगत करना है, ऐसा लगता है जैसे तेजिंदर आख्यान के भीतर कविता रचते हैं। ''उसके मन के अंदर एक चीता है जो दौड़ता रहता है, एक तेज़ तर्रार चोंच और बड़े-बड़े पंखों वाला पक्षी है जो आसमान में उड़ता रहता है।'' ( पृ0 120 ) ऐसे कथन जहॉं तेजिंदर की उपलब्धि है वहीं जेम्स के चरित्र के उन्नायक । जेम्स के मानस में बराबर उथल-पुथल बनी रहती है। उसका आत्मबोध बार-बार उसे विवश करता है, रोम तक जाना उसे पलायन लगता है जबकि जेम्स परिस्थितियों से दूर भागने से बचता रहता है।
जेम्स बिशपस्वामी के भीतर के दुष्ट व्यक्ति को जान लेता है। बिशप जो कभी राजा की तरह होता है तो कभी एक कुशल व वाकपटु राजनीतिज्ञ की तरह । वह जेम्स के द्वारा भूख की दलीलों को नहीं मानता वह जेम्स से साफ़-साफ़ कह देता है....... ''हमें अपनी स्ट्रेटेजीबहुत सोच समझकर तय करनी होगी कि कहीं हमारी सेवा या प्रार्थना का लाभ कॉंग्रेस या आर. एस. एस. को न मिल जाये,'' ( पृ0 123 ) यह उसकी राजनैतिक दूरदृष्टि है, यही दृष्टि धर्मप्रांत में प्रार्थना और सेवा के राजनैतिक महत्व को उजागर करती है । यहॉं निस्वार्थ धर्मभाव महज एक छल है । वह जेम्स के सच और दलित संघर्ष को एक सपना और दुनिया के इस महालोकतंत्र को बाज़ार कहता है किंतु जेम्स का प्रतिरोध भी खुलकर सामने आता है वह बिशप से स्पष्ट कह देता है कि.... '' सपनो के इस बाज़ार पर आपका अधिकार ख़त्म हो रहा है।'' (पृ0 124 ) बिशप के चेहरे पर एक क्रूर जमींदार का चेहरा उतर आता है जो अपने बंधुआ मज़दूर के चेहरे पर विद्रोह की रेखाऍं पढ़ लेता है। बिशप एक शोषक है और जेम्स शोषित। बिशपस्वामी जेम्स के आत्मबोध, अतीत के प्रति लगाव और अंत: परिवर्तन को बूझ लेता है इसलिए उन दोनो में एक नई तरह की ज़िरह होती है। जेम्स खाखा की छटपटाहट जंगल में व्याप्त समाज की छटपटाहट, एक-एक आदिवासी की भूख उसे सताती है तभी तो वह बीशपस्वामीसे यह सवाल करता है,...... ''भूख हमेशा दलित या आदिवासी ही क्यों होती है ? " ( पृ0 123 ) जेम्स का यह आवेश स्वाभाविक है जो धर्म के छद्म को खोल देता है, साम्राज्यवादी व्यूह को तोड़ देता है।
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शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011
आख्यान - 2
सवाल ट्रीटमेंट का....................आग की लपटें
उपन्यास में जहॉं लेखकीय हस्तक्षेप प्रारंभ होता है वहॉं शुरू में तो उरॉंव लोगों की उत्पत्ति के खोजबीन की कोशिश की गई है किंतु लेखक शीघ्र ही मूल सवालों पर आ जाता है, क्योंकि सत्य का कोई प्रामाणिक इतिहास नहीं है न ही अस्तित्व के उत्स का प्रमाण। आदित्य जानना चाहता है...जेम्स से जानना चाहता है कि उरॉंव आदिवासी अपनी विशिष्ट जीवन शैली और निजी संस्कृति के बावजूद मिशनरीयों की शरण में क्यों चले गये ? जेम्स अन्य बातों के साथ एक बेहद महत्वपूर्ण बात कहता है....''जिस समय हमें अपने ही देश और समाज के लोगों के बीच जंगलियों और आदिवासियों की तरह रहना पड़ रहा था, ऐसे कठिन समय में उन्होंने बताया कि तुम मनुष्य हो, हमारी तरह । यह हमारे लिए एक ऐसी बात थी कि जिसके सामने जीवन छोटा था और हमारे पूर्वज उनके साथ हो गये।'' (पृ0 92.) यह जेम्स के धर्मांतरण की आत्मस्वीकृति है। आज भी कितना स्वीकार करता है हमारा समाज आदिवासियों को, यह सोचनीय है।दो बच्चों सहित स्टैंस की हत्या जेम्स और सोज़ेलिन मिंज को गहरे प्रभावित करती है। आदित्य उनकी सोहबत के बावजूद इस मनोवैज्ञानिक तर्क से जूझता है कि ग़ैरआदिवासी होने के कारण वह जेम्स और सोज़ेलिन की संवेदनशीलता को महसूस करने से चूक तो नहीं रहा किंतु शीघ्र इस ख़याल को झटक देता है। सोज़ेलिन मिंज को गहरा आघात स्टेंस की पत्नी जो उन दो बच्चों की मॉं थी,को लेकर था।वह उसका दोष जानना चाहती है।एक स्त्री होने के नाते वह स्पष्ट महसूस कर रही थी उसकी दशा को। सोज़ेलिन उद्वेलित होती है - करती है। सारे मनुष्य यदि निर्वस्त्र हो जाए तो प्राकृतिक रूप निर्मित हो जाएगा, किसी में कोई फ़र्क़ ही नही़ रह जायगा किंतु वैचारिक बर्बरता बनी रहेगी। यदि धर्म, विचारधारा - भेदभाव की खोलों से बाहर आए तो, मनुष्य ....केवल मनुष्य है, कोई अनुयायी - विचारक या धर्मावलंबी नहीं।
दे शुड ज्वाईन द मेन स्ट्रीम ऑफ़ नेशनल लाईफ़,.....................................
सिस्टर अनास्तासिया की अवस्थिति स्वाभाविक है। वह शांत है या अशांत हो तो भी उसके मन की कोई हलचल दिखलाई नहीं पड़ती । वह अब पवित्र बाइबिल के अतिरिक्त अन्य किताबें पढ़ती रहती है। नामनाकला चर्च के बाहर हुए बमविस्फोट के बाद से वह भयभीत है। वह जेम्स के प्रति चिंतित है। अनास्तासिया जेम्स को लेकर अपने बचपन में जाती रहती है और भाई - बहन के मध्य लाड़ - दुलार की वत्सल स्मृति जाग उठती है। जेम्स बातचीत के दौरान उससे पुछता है किसी और राह के बारे में किंतु अनास्तासिया के पास इसका कोई जवाब नहीं है। वह महसूस करती है कि उनके पास चच्र और मिशनरीज़ का कोई विकल्प नहीं है जबकि वह स्वयं हिंसा के दुख और विषाद से ग्रस्त है। चर्च/मिशनरीज़ के प्रति उसकी आस्था डगमगा जाती है और हिंदूवादी संगठनों का हिंसक रूप उसे आशंकित करता है। हिंसा और असुरक्षा के इस समय को सवाल बनाकर वह आदित्य के सम्मुख उपस्थित करती है किंतु आदित्य बड़े अच्छे ढंग से उन्हें राष्ट्रीय धारा में शामिल होने के लिए कहता है। आदित्य का मानना है कि जो कुछ भी हो रहा है वह एक राजनैतिक परिदृश्य है, वॉंछित है ऐसे में ईसाई मिशनरियों को अलग - थलग न रहकर राष्ट्रीय जीवन की मुख्य धारा में शामिल होना चाहिए। अनास्तासिया असहमत रहती है आदित्य के इस मंतव्य से किंतु उसके भीतर धर्मांतरण के बाद की स्थिति ....अपमानबोध आकार लेता है। दरअसल वह धर्मांतरण के ज़रिये जिस सभ्यता - संस्कृति और जीवन की चकाचौंध के आकर्षण की ज़द में जाती है, शीघ्र ही उसका मोहभंग होता है और वह अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहती है.....यही वह स्थिति है जहॉं वह और उसका भाई जेम्स भी अवसन्न है, परिणामत: एक चुप्पी हे, भीतर ही भीतर खोदती हुई। हिंसा और असुरक्षा उन्हें लगातार भयभीत कर रही है। आदित्य, जेम्स और अनास्तासिया की यह ज़िरह धर्म-परिवर्तन के कारणों की खोज है। अनास्तासिया वी. एस. नायपाल की इस बात को नकार देती है कि पहले हम अपना धर्म रिजेक्ट करते हैं तब हम दूसरा धर्म स्वीकार करते हैं। (पृ0 104) वह नायपाल की दूसरी बात जो बाबरी मस्जिद के संदर्भ में थी, उसे एक खीज या झल्लाहट कहती है। वह यहॉं साम्प्रदायिकता का एक बंद कपाट खोलती है.....''मुझे तो लगता है कि वी. एस. नायपाल जैसे बुद्धिजीवी और पश्चिम का मीडिया हमारी बहूत सारी परेशानियों के लिए ज़िम्मेदार हैं और दे मस्ट बी इग्नोरड, इफ़ वी विश यू सैटल पीसफुली। यह उनके षड्यंत्र का हिस्सा है, वे यह तय करते हैं कि इस साल हिंदू सिख, फिर अगले साल हिंदू मुसलमान और फिर हिंदू ईसाई, वे हमारी बिसात पर अपनी मोहरे खेलते हैं जिनके निर्णायक वे स्वयं ही होते हैं।'' (पृ0 104) अनास्तासिया की यह बात उल्लेखनीय है जो कि आज का भयावह सच है।भषा, जाति और धर्मों के इस अजायब घर में बाहरी इशारों से कठपुतलियों की तरह नचाये जाते हैं लोग। साम्प्रदायिक हिंसा की शुरूआत थोपी गई या ओढ़ी गई वैचारिक हिंसा से होती है। अनास्तासिया शांत है, उसका उदास चेहरा उसे शांत प्रदर्शित करता है।
'इट वाज़ ए रिवोल्यूशनरी जजमेंट',............................................................
.........................क्रमश:...........देखें..... समापन किस्त.............................................................
उपन्यास में जहॉं लेखकीय हस्तक्षेप प्रारंभ होता है वहॉं शुरू में तो उरॉंव लोगों की उत्पत्ति के खोजबीन की कोशिश की गई है किंतु लेखक शीघ्र ही मूल सवालों पर आ जाता है, क्योंकि सत्य का कोई प्रामाणिक इतिहास नहीं है न ही अस्तित्व के उत्स का प्रमाण। आदित्य जानना चाहता है...जेम्स से जानना चाहता है कि उरॉंव आदिवासी अपनी विशिष्ट जीवन शैली और निजी संस्कृति के बावजूद मिशनरीयों की शरण में क्यों चले गये ? जेम्स अन्य बातों के साथ एक बेहद महत्वपूर्ण बात कहता है....''जिस समय हमें अपने ही देश और समाज के लोगों के बीच जंगलियों और आदिवासियों की तरह रहना पड़ रहा था, ऐसे कठिन समय में उन्होंने बताया कि तुम मनुष्य हो, हमारी तरह । यह हमारे लिए एक ऐसी बात थी कि जिसके सामने जीवन छोटा था और हमारे पूर्वज उनके साथ हो गये।'' (पृ0 92.) यह जेम्स के धर्मांतरण की आत्मस्वीकृति है। आज भी कितना स्वीकार करता है हमारा समाज आदिवासियों को, यह सोचनीय है।दो बच्चों सहित स्टैंस की हत्या जेम्स और सोज़ेलिन मिंज को गहरे प्रभावित करती है। आदित्य उनकी सोहबत के बावजूद इस मनोवैज्ञानिक तर्क से जूझता है कि ग़ैरआदिवासी होने के कारण वह जेम्स और सोज़ेलिन की संवेदनशीलता को महसूस करने से चूक तो नहीं रहा किंतु शीघ्र इस ख़याल को झटक देता है। सोज़ेलिन मिंज को गहरा आघात स्टेंस की पत्नी जो उन दो बच्चों की मॉं थी,को लेकर था।वह उसका दोष जानना चाहती है।एक स्त्री होने के नाते वह स्पष्ट महसूस कर रही थी उसकी दशा को। सोज़ेलिन उद्वेलित होती है - करती है। सारे मनुष्य यदि निर्वस्त्र हो जाए तो प्राकृतिक रूप निर्मित हो जाएगा, किसी में कोई फ़र्क़ ही नही़ रह जायगा किंतु वैचारिक बर्बरता बनी रहेगी। यदि धर्म, विचारधारा - भेदभाव की खोलों से बाहर आए तो, मनुष्य ....केवल मनुष्य है, कोई अनुयायी - विचारक या धर्मावलंबी नहीं।
दे शुड ज्वाईन द मेन स्ट्रीम ऑफ़ नेशनल लाईफ़,.....................................
सिस्टर अनास्तासिया की अवस्थिति स्वाभाविक है। वह शांत है या अशांत हो तो भी उसके मन की कोई हलचल दिखलाई नहीं पड़ती । वह अब पवित्र बाइबिल के अतिरिक्त अन्य किताबें पढ़ती रहती है। नामनाकला चर्च के बाहर हुए बमविस्फोट के बाद से वह भयभीत है। वह जेम्स के प्रति चिंतित है। अनास्तासिया जेम्स को लेकर अपने बचपन में जाती रहती है और भाई - बहन के मध्य लाड़ - दुलार की वत्सल स्मृति जाग उठती है। जेम्स बातचीत के दौरान उससे पुछता है किसी और राह के बारे में किंतु अनास्तासिया के पास इसका कोई जवाब नहीं है। वह महसूस करती है कि उनके पास चच्र और मिशनरीज़ का कोई विकल्प नहीं है जबकि वह स्वयं हिंसा के दुख और विषाद से ग्रस्त है। चर्च/मिशनरीज़ के प्रति उसकी आस्था डगमगा जाती है और हिंदूवादी संगठनों का हिंसक रूप उसे आशंकित करता है। हिंसा और असुरक्षा के इस समय को सवाल बनाकर वह आदित्य के सम्मुख उपस्थित करती है किंतु आदित्य बड़े अच्छे ढंग से उन्हें राष्ट्रीय धारा में शामिल होने के लिए कहता है। आदित्य का मानना है कि जो कुछ भी हो रहा है वह एक राजनैतिक परिदृश्य है, वॉंछित है ऐसे में ईसाई मिशनरियों को अलग - थलग न रहकर राष्ट्रीय जीवन की मुख्य धारा में शामिल होना चाहिए। अनास्तासिया असहमत रहती है आदित्य के इस मंतव्य से किंतु उसके भीतर धर्मांतरण के बाद की स्थिति ....अपमानबोध आकार लेता है। दरअसल वह धर्मांतरण के ज़रिये जिस सभ्यता - संस्कृति और जीवन की चकाचौंध के आकर्षण की ज़द में जाती है, शीघ्र ही उसका मोहभंग होता है और वह अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहती है.....यही वह स्थिति है जहॉं वह और उसका भाई जेम्स भी अवसन्न है, परिणामत: एक चुप्पी हे, भीतर ही भीतर खोदती हुई। हिंसा और असुरक्षा उन्हें लगातार भयभीत कर रही है। आदित्य, जेम्स और अनास्तासिया की यह ज़िरह धर्म-परिवर्तन के कारणों की खोज है। अनास्तासिया वी. एस. नायपाल की इस बात को नकार देती है कि पहले हम अपना धर्म रिजेक्ट करते हैं तब हम दूसरा धर्म स्वीकार करते हैं। (पृ0 104) वह नायपाल की दूसरी बात जो बाबरी मस्जिद के संदर्भ में थी, उसे एक खीज या झल्लाहट कहती है। वह यहॉं साम्प्रदायिकता का एक बंद कपाट खोलती है.....''मुझे तो लगता है कि वी. एस. नायपाल जैसे बुद्धिजीवी और पश्चिम का मीडिया हमारी बहूत सारी परेशानियों के लिए ज़िम्मेदार हैं और दे मस्ट बी इग्नोरड, इफ़ वी विश यू सैटल पीसफुली। यह उनके षड्यंत्र का हिस्सा है, वे यह तय करते हैं कि इस साल हिंदू सिख, फिर अगले साल हिंदू मुसलमान और फिर हिंदू ईसाई, वे हमारी बिसात पर अपनी मोहरे खेलते हैं जिनके निर्णायक वे स्वयं ही होते हैं।'' (पृ0 104) अनास्तासिया की यह बात उल्लेखनीय है जो कि आज का भयावह सच है।भषा, जाति और धर्मों के इस अजायब घर में बाहरी इशारों से कठपुतलियों की तरह नचाये जाते हैं लोग। साम्प्रदायिक हिंसा की शुरूआत थोपी गई या ओढ़ी गई वैचारिक हिंसा से होती है। अनास्तासिया शांत है, उसका उदास चेहरा उसे शांत प्रदर्शित करता है।
'इट वाज़ ए रिवोल्यूशनरी जजमेंट',............................................................
.........................क्रमश:...........देखें..... समापन किस्त.............................................................
रविवार, 2 जनवरी 2011
मनुष्य की आस्था के रूपांतरण का आख्यान
विवेचन :
मनुष्य की आस्था के रूपांतरण का आख्यान
ओनली गॉड नोज़..........................
समय को आख्यान चाहिए । वह अपना काला चेहरा दीपदीपाती रोशनी में उजला करना चाहता है । समय भयभीत है बदलाव की ऑंधी में , उसकी भीरूता ही उसे चकनाचूर होने से बचा रही है । वह किसी भी चिनगारी का इस्तेमाल कर सकता है । वह धर्म की , भूख की या इसी तरह की कोई मानवीय वस्तु हो सकती है । समय ने चिनगारी के तौर पर भीड़ का भी इस्तेमाल किया है , यह भीड़ जुनूनी या उन्मादी रही है । ऐसी कई भीड़ तरह - तरह के वर्ग , विचार , पंथ , समुदाय और मुखौटे के रूप में , इतिहास में दर्ज़ है । भीड़ युद्ध , क्रांति , आंदोलन और परिवर्तन के रूप में भी इतिहास में उपलब्ध हो जाती है किंतु ऐसी कई उपलब्धियॉं आजकल संदिग्ध हो गई हैं । भीड़ के हाथों में जो मशालें हैं वे रोशनी कम आग ज्यादा उगलती रही हैं , इस आग ने जलाया है वह सब , जिसे मनुष्य संजोता रहा है । मनुष्य की दुनिया तपती - पिघलती - जलती रही है । समय के मुख पर कालिख बढ़ती ही गई ।
तेजिंदर का उपन्यास 'काला पादरी' एक ऐसे देशकाल की कथा है जो अपने कायांतरण की बाट जोह रहा है । इतिहास मानवीय बर्बरता का साक्षी तो रहा ही है किंतु विखंडित वर्तमान जो भुगत रहा है उसे यहॉं बड़ी बारीक़ी से दर्ज़ किया गया है । उत्तर आधुनिकता का ढिंडोरा पिटती दुनिया के एक अँधेरे कोने में अभिशप्त जीवन प्रविधि से गुज़रती पीढ़ी की यातना को स्वर देते हुए कथाकार 'सबाल्टर्न' को मुखर करता है ।
मनुष्य की आस्था का रूपांतरण............................
इस उपन्यास में सरगुजा के आदिवासी इलाके में जनमानस को टटोलता विचार और अतड़ियों को तमड़ती दृष्टि , दोनों गहरे तक जाते हैं तथा जीवन परिवर्तन के केंद्र में 'भूख' को पाते हैं । आदिवासी इलाके में जीवन की छानबीन 'भूख के भूगोल की छानबीन है । यहॉं के जीवन का परिवर्तन आकस्मिक नहीं बल्कि प्रायोजित है । इसाई मिशनरीज़ किस तरह 'भूख' का आश्रय लेकर 'आस्था' के परिवर्तन में लगी है, यहॉं देखा जा सकता है । यहॉं धर्मांतरण की असलियत खुलकर सामने आती है, वह इकहरी नहीं है, उसे वर्तमान और पूर्ववर्ती पीढ़ी की विचार-सरणियों में परखा गया है। धर्म की तार्किकता यहॉं सीधे अतीत की ओर ले जाती है किंतु तर्कप्रणाली अत्याधुनिक है। समाचार-विचार और बाज़ार में फँसा हुआ जीवन छिप-छिपकर झॉंकता है और धर्म को लेकर एक ऐसी 'पॉलिमिक्स' निर्मित हो जाती है जिस पर वैचारिक विखंडन पूरी तरह से हावी है। तमाम सुख-सुविधायुक्त जीवन आख़िर डगमगा जाता है, ओढ़ी हुई विचारधारा और जीवन-प्रणाली उसे भीतर से ऐसा स्खलित करती है कि 'आस्था' ही अपना मार्ग नहीं बदलती बल्कि प्रत्येक अवस्थिति का अतिरेक ही बदल जाता है। वस्तुत: यह मनुष्य की आस्था के रूपांतरण का आख्यान है।
आगमन और प्रस्थान के मध्य......................तनाव की काली नदी...
चरित्र व्यक्ति होते-होते रह जाते हैं जबकि व्यक्ति अक्सर चरित्र हो जाते हैं। जेम्स खाखा एक ऐसा ही व्यक्ति है जो तेजिंदर के यहॉं 'काला पादरी' के चरित्र में परिणत हुआ है। जेम्स खाखा के होने को पुरजोर और संभव बनाता है आदित्य पाल । आदित्य वह चेहरा है जिसके अभाव में इस कथा के सारे चेहरे बेचेहरा हो जाते, एक सहायक चरित्र के रूप में आदित्य ने इस कथा के मुख्य चरित्र को गौण होने से बचाया है। वह एक कर्मचारी है जो भोपाल से स्थानांतरित होकर अम्बिकापुर आता है और अम्बिकापुर से नागपुर स्थानांतरित होकर भोपाल जाता है। उसके आगमन और प्रस्थान के मध्य ही पूरा उपन्यास लगभग यथार्थ से परिघटित होता है। वह कथा-क्षेत्र के भूगोल से धीरे-धीरे वाकिफ़ होता है और जेम्स को जीवन के भूगोल से वाकिफ़ कराता है। दरअसल वही मथता है जेम्स को या जेम्स के इर्द-गिर्द उपस्थित उन सारे लोगों को जिनका सीधा संबंध है आस्था के रूपांतरण से। आदित्य को कथाविवेचन के शास्त्रीय आधार पर हम एक 'सूत्रधार' कह सकते हैं और मौजूदा राजनैतिक दौर की वैधानिक भाषा में एक चश्मदीद गवाह । वह पूरी तरह सफल होता है अवस्थितियों को खंगालकर समय के निक्षेप तक पहुँचने में। उसके अलावा और कौन कह सकता जेम्स से...''तुम्हारा यह सरगुजा, लोकतंत्र का सबसे सस्ता सामंतवादी संस्करण है,'' (पृ0 16) दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सुदूर जंगली इलाके में ,सघन जनजातीय क्षेत्र में, कहॉं तक व्याप्त है तंत्र का लोकरूप ? यह सोचनीय है। आदित्य की यह बात जेम्स के चेहरे पर 'तनाव की काली नदी' उपस्थित कर देती है, जिसमें जेम्स डूबने को विवश हो जाता है, किंतु आगे की कई घटना-परिघटनाओं में जेम्स का आत्मबोध-आत्ममंथन और जन्मजात सांस्कृतिक आग्रह उसके चरित्र को दृढ़ बनाते हैं।
अतीत - वर्तमान और भविष्य को लेकर जेम्स अपनी परिणति के स्वीकार में लगातार जूझता रहता है। उसका बुद्धि-कौशल, तार्किकता व सत्ता और धर्म की आधुनिक चिंतनशीलता उसे रवींद्रनाथ टैगोर के चरित्र 'गोरा' के काफ़ी निकट ले जाती है किंतु एक बड़ा फ़र्क़ है तीव्रता का। 'गोरा' के ज़हन में आवेग की महती भूमिका है जो धर्म-दर्शन और राजनीति की तार्किकता के साथ गोरा की कार्यप्रणाली को निष्पादित करता है जबकि जेम्स में बौद्धिकता के साथ भावुकता अपने पूरे दम-खम के साथ आकर, जेम्स की कार्यप्रणाली को शिथिलता प्रदान करती है। वैसे यह चरित्रगत बदलाव समय के बदलाव की ही वजह है।
पॉलिटिकल अंडरटोन्स.........................इट्स पार्ट ऑफ़ गेम फ़ॉर देम...
राय साहब सामंत का प्रतिनिधि बनकर उपस्थित होता है। उसके अपने रंग-ढंग हैं अपना ढब और हस्तक्षेप भी। राय साहब के लिए मंत्री भी एक पुर्जा है। करमसाय एक ऐसा ही मंत्री है जो राय साहब के लिए सरकारी सुविधा मुहैया करता है। अवांछित लोगों के द्वारा सरकार या तंत्र का उपभोग सत्ता के दब्बूपन को उजागर करता है। आदित्य व्यवस्था की विसंगति के विरोध का अभाव स्पष्ट महसूस करता है... ''मैं जब अपने इर्द-गिर्द देखता तो मुझे लगता कि ये सारे लोग जिनमें मैं भी शामिल हूँ, उन्हीं लोगों से मान्यता प्राप्त करने की होड़ में लगे हैं, जिनका अपने अंतर्मन से विरोध करते हैं। हम उसी व्यवस्था का संरक्षण चाहते हैं, जिसके विरोध में बड़ी-बड़ी बातें करते हैं । ऐसा शायद हम इसलिए करते हैं कि हम अपना नैतिक साहस कहीं न कहीं खो चुके होते हैं।'' (पृ0 16) यहॉं आदित्य के ज़रिए मनुष्य के नागरिक होने के उपरांत की पतनशीलता मुखर होती है। इस तरह अनेकानेक मानवीय आधारों के पतन से भूख मूर्त होती जाती है। जेम्स और आदित्य के आसपास बिखरी और पसरी भूख्ा उन्हें सोचने के लिए बाध्य करती है, वे चिंतित भी होते हैं किंतु चिंतन और विचारों में भटकने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। आदित्य जब बीजाकुरा गॉंव में भूख से मृत्यु संबंधी समाचारों को पढ़ता है तब भूख के आकार की खोज शुरू करता है किंतु सिहर जाता है। 'भूख से मृत्यु, दुनिया की भयावह कल्पना के रूप में उभरती है' जिसकी सच्चाई जानने के लिए वह जीवन के गहरे तक उतरता है। आदित्य और जेम्स दोनों गॉंधीवाद की छानबीन करते हैं। उनके ईस यत्न में गॉंधी की महत्ता और वर्तमान में उनके विचारों की प्रासंगिकता को समझने की कोशिश स्पष्ट झलकती है। यहॉं फासिस्ट हिंदुवाद को गॉंधीवाद से ख़तरा और गॉंधीवाद का राजनैतिक इस्तेमाल भी उजागर होता है। जेम्स और आदित्य अपनी ज़िरह में इस तह तक जाने की कोशिश करते हैं कि गॉंधी ने सचमुच अछूतों के लिए कुछ किया या उनका राजनैतिक इस्तेमाल किया। इस ज़िरह के नतीजे नज़रिये के हिसाब से अलग-अलग हो सकते हैं किंतु महत्वपूर्ण बात यह है कि यह संदर्भ 'सबाल्टर्न' का है, वही जो भूख, दरिद्रता और विधर्म की चपेट में है। आदित्य बार-बार जेम्स के मन-मस्तिष्क को खोदता है 'भूख के प्रति चर्च का रवैया' जानना चाहता है। जेम्स उससे कहता है... ''वह तो पॉलिटिकल अंडरटोन्स पर र्निभर करता है,'' (पृ0 25) यह चर्च के राजनैतिक प्रयोजन की स्पष्टोक्ति है। इसी तरह यह ज़िरह आगे राय साहब ,चर्च, पैलेस और हिंदुवादी सरकार की विकृति को उभारती है। ये सभी 'भूख से मौत' के लिए कुछ कारगर नहीं करते और एकदूसरे का मुँह देखते हैं, इनके अपने-अपने स्वार्थ हैं। अक्सर ऐसा होता है शक्तियों (समर्थों) की अंतर्कलह में सामान्यजन पिसता है। भूख्ा के मूर्तन आदित्य जिस आकार की तलाश करता है उसे जेम्स उसके सम्मुख 'बिरई लकड़ा' की मौत के बहाने सजीव उपस्थित कर देता है और साथ्ा ही यह भी स्थापित करता है कि ग़रीबी या दरिद्रता संपन्न (शक्तिसंपन्न) लोगों के खेल का एक हिस्सा है। जेम्स बार-बार मौजूदा राजनीति में विचारधारा को खंगालता है। वह सोचते हुए महसूस करता है कि घृणा ने हमें ग्रस लिया है।
काला यूरोप.....काली मेम........अमूर्त आकृतियॉं....
जेम्स की सारी चेष्टाऍं मानवीय हैं। वह अनुरक्त है। सोज़ेलिन मिंज उसके आसक्ति के दरक को जान जाती है, वह उसके भीतर दरकती आस्था और विश्वास को देख लेती है। ''सरगुजा एक तरह से काला यूरोप है और तुम काली मेम साहब'' जेम्स का सोज़ेलिन के प्रति यह कथन जेम्स की वाँछा के भैतिक पक्ष का उद्धाटन है। यूरोप, जो कि हमारी संस्कृति का विलोम है, वह उसे सरगुजा में महसूसना चाहता है, तमाम कालिख के बावजूद --यही कालिख संभव बनाती है काली मेम साहब के भोग के स्फूरण को। जेम्स के भीतर बहुत भटकन है। वह सोज़ेलिन में अपना घर तलाशता है। सोज़लिन इस कथा में समय की एक खरोंच है जो दीवारों पर अपने नाख़ून से अमूर्त आकृतियॉं गढ़ती है। वह जेम्स की भटकन से वाकिफ़ है किंतु अपनी प्रतीति के साथ वह स्वयं भी उन्मुक्त है... ''उसने जेम्स को थोड़ी देर के वास्ते इस बात के लिए अभिशप्त कर दिया कि वह उसे मरूस्थल के किसी कुऍं की तरह स्वीकार कर ले। अब रेत के कुओं में मुंडेर तो होती नहीं, और अगर होती भी हो तो उसका कोई पता ठिकाना तो उसने जेम्स को बताया नहीं था। वह एक अंधे कुऍं की तरह थी जिसमें जेम्स उतर रहा था। वह पूरी तरह उसकी गिरफ़्त में था।'' (पृ0 32) क्या यह रूमानियत है? हो न हो किंतु यह राग का प्रकृतिस्थ रूप है जो सुंदर से सुंदरतम की सृष्टि करता हुआ रचता है मनुष्य को। सोज़ेलिन जेम्स के स्पर्श को नहीं नकारती, वह जानती है पूर्वनिर्मित आकृतियों को अपनी इच्छानुसार ढालने की मुश्किलें और वह सफल भी होती है खिलखिलाकर हँसने में या हँसी की खिलखिलाहट को सहेज पाने में।
इट वाज़ ए वार ऑफ़ इमेजेज़.........यू रादर टेम्ड अस...
जेम्स और आदित्य की सोहबत ख़ास मायने रखती है। वे एक दूसरे के ज़रिए अपनी वैचारिकता को मथते हैं। फ़ादर मैथ्यूज़ से मुलाकात के दौरान जेम्स अपनी अतीत पीढ़ी की बात करके अपनी आस्था के मूल में जाना चाहता है जबकि आदित्य के भीतर बैठा अख़बारनवीस फ़ादर को खोद-खोदकर भूख और धर्मांतरण की परतें खोलना चाहता है। फ़ादर बार-बार सारी कारगुजारियों को प्रभु की इच्छा पर थोपकर स्वश्यं को और मिशनरीज़ को निर्दोष बताने का यत्न करता है। जेम्स के पूर्वजों के धर्मांतरण पर वह आदित्य की जिज्ञासा को शांत करने के लिए कहता है.....''इनके पास ईश्वर का कोई इमेज़ नहीं था डियर, जिसकी ओर ये आस भरी निग़ाह के साथ देख सके, जब हम यहॉं आया तो राजा भी अपना देवी को प्लांट कर रहा था। यू नो हाऊ टू प्लांट ए थाट, इट इज़ वेरी इंपार्टेंट, हमने भी प्रभु यीशु की इमेज़ प्लांट कर दी, इट वाज़ ए वार ऑफ़ इमेजेज़, जिसमें जीत हमारी हुई,'' (पृ0 44-45) करोडो देवी-देवताओं की आस्था वाले देश में फ़ादर का यह कथन हास्यास्पद है। आदिवासी शांषित होते रहे हैं,धर्मांतरण के पूर्व राजा(सामंत-जमींदार) और धर्मांतरण के बाद थोपी गई आस्था के द्वारा। फा़दर का यह कथन जेम्स के पूर्वजों को ईश्वर विहीन साबित कर रहा है। 'इट वाज़ ए वार ऑफ़ इमेजेज़' यह एक साम्राज्यवादी तर्क है।यहॉं साम्राज्यवाद धर्म को अस्त्र के रूप में इस्तेमाल कर हावी हुआ है। दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाला आदिवासी ईश्वर विहीन नहीं हो सकता क्योंकि उनकी अपनी निजी संस्कृति होती/रही है। आदित्य और फ़ादर की इस बातचीत का जेम्स पर गहरा असर होता है, वह आवेशित होता है ओर फ़ादर की अनुमति लेकर वह भी फ़ादर से सवाल करता है.....''क्या यह सच नहीं कि हमारी इमेजेज़ में पहाड़ थे, नदिया थीं, पेड़ थे,शेर थे , चीते थे, और राजा ने हमें बंधुआ बना दिया, फिज़िकली और इक्नॉमिकली एक्सप्लायट किया, लेकिन आपने क्या ? यू रादर टेम्ड अस, आपने हमें पालतू बना दिया, हमारे लिए हिंदू फंडामेंडलिस्टों और आपमें अब कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं है। हमारी सारी इमेजेज़ छीन ली आप लोगों ने.......''(पृ0 45) जेम्स का आक्रोश लाजिमी है। सच्चाई यहॉं अपने कड़वेपन की बजाय तीखे तेवर लेकर उजागर हुई है। यह जेम्स के चरित्र का अहम हिस्सा है जो उसके भीतर के हाहाकार को प्रकट करता है,दरअसल जेम्स किसी भी वजह से बौना नहीं होना चाहता, वह जीना चाहता है अपने वर्तमान में--अपने पूरे आत्मसम्मान के साथ,वह मुक्त होना चाहता है अतीत की उन परछाइयों से जिसमें राजा दुर्जन साल के वंशज और वहशी लुटेरे हैं, अपमान, ज़िल्लत और ग़ैर संवेदनशीलता से भरा एक गटर है। आत्मसम्मान के साथ जीने की चाह ही जेम्स को अपनी मॉं से असहमति की ओर ले जाती है। मॉं का यह विचार कि वे (जेम्स और उसकी बहन अनस्तासिया) अपना पूरा जीवन चर्च की सेवा में बिताऍं, एक तरह का बंधुआ विचार है। 'विचारों का बंधुआ होना'-- इस तरह से किसी चरित्र के द्वारा हिंदी में शायद पहली बार सोचा गया है। जेम्स के भीतर हाहाकार बढ़ता ही जाता है। उसका अस्तित्वबोध एक बात स्पष्ट कर देता है कि धर्मांतरण--जो भूख मिटाने का कारगर तरीका था वही ईश्वर थोप देता है--विवश कर देता है। थोपे गए ईश्वर और विवशता में जीना बंधुआ जीवन है। जेम्स का अंतर्द्वंद्व जेम्स को निखारता है। ईश्वर या गॉड से उसका कोई झगडा़ नहीं है वह तो उन लोगों पर खफ़ा है जिन्होंने उसके पुरखों से सांस्कृतिक स्वायत्तता छिनी, प्रकारांतर से उसे संस्कारों का अभाव खलता है क्योंकि वह ईसा के सलीब की तरह मिशनरीज़ द्वारा थोपे गए जीवन को ढो रहा है।
सोज़ेलिन मिंज काफ़ी दूर तक जेम्स की हमक़दम है किंतु वह अपनी 'निजता' बचाए हुए है ।उसके भीतर कोई ज़िरह नहीं है या हो भी तो वह प्रकट नहीं हो पाती । धर्मांतरण-- अपनी निजता खोना है।
'सोना रूपा तुरू झबराकस डरणखस.............जिना पानी एदआ चिआ'...
ब्रदर हरपाल आस्था के अंधेपन, ढोंग को मुखर करता है। वह कर्महीनता या अकर्मण्यता व मक्कारी का पोषक है। आदित्य ब्रदर हरपाल को भी टटोलकर बाहर निकालने में सफल होता है।
भटहरा गॉंव में उपस्थित दृश्य जेम्स और आदित्य को प्रभावित कर जाता है। वह बैगा जिसके हाथ में झाड़ू है और जो एक भूख-पीड़ित के उद्धार के उपक्रम में लगा हुआ है, अंधविश्वास का शासक है। आदिवासी समाज में व्याप्त अंधविश्वास यहॉं जीवंत रूप में प्रस्तुत हुआ है। भूखपीड़ित इस दृश्य को और भयावह बना रहा है.... ''वह आदमी जब अपना मुँह खोलता है तो उसका मुँह किसी गुफा की तरह नज़र आता है और लगता है कि वह आसपास खड़े सभी लोगों को निगल जाएगा'' (पृ0 71) वह व्यक्ति आख़िर मर जाता है। बैगा उसकी मृत्यु पर भी अंधविश्वास गढ़ता जाता है। यहॉं लेखक ने 'टेबू' या संस्कृति-भाषा (पबलावर, डुबल, पासल, टांगल, जैसे शब्द ) का उपयोग किया है तथा 'टोटेम' (धर्मप्रतीक) का सहारा लिया है। ''सोना रूपा तुरू झबराकस डरणखस'' और ''जिना पानी एदआ चिआ'' जैसे भाषायी प्रयोग किसी आदिम मिथक की ओर संकेत करते हैं।
धुऑं.....व्हाट इज़ बीयांड स्मोक,..............पॉलिटिकल कल्चर...
जेम्स खाखा के लिए 'राजा' शब्द का विशेष महत्व है। उसके अतीत से सरगुजा के वर्तमान तक और बाइबिल में वर्णित राजा की भूमिका उसे आक्रोश और उदासी से भर देती है। ऐसे समय में वह बिशप स्वामी के पास जाता है, उसका उद्वेलन बना रहता है। वह देखता है कि बिशपस्वामी के दो रूप है एक वह जो सारी जिज्ञासाओं को शांत करता है, दूसरा वह जो बेगाना है, रोमदूत है।
जेम्स दीवारों पर 'गर्व से कहो हम हिन्दू हैं' और 'यहॉं रहना है तो हिन्दू बनकर रहना होगा', जैसी इबारतें पढ़कर सहम जाता है। उसकी भीरूता धर्म-विश्वास की भीरूता है। अपने सामने गुज़र रही जीप, सिर पर कपड़ा बॉंधे और जय बजरंगबली' जैसे कुछ नारे लगा रहे युवकों से उसे ''क्यों बे चिरई...' जैसा उपहासास्पद संबोधन सुनाई पड़ता है साथ ही यह उलाहना ....''चल रे पादरी, मंदिर में तोहे शिवजी बुलाये हैं।'' ये युवक कौन है? इसकी निश्चित पहचान नहीं है किंतु यह तय है कि यह धर्म का उग्र चेहरा है, एक उन्माद है जिसे वह यौवन ढो रहा है जो दिशाहीन है। इसी समय चर्च में एक धमाका होता है, चर्च की दीवार का एक हिस्सा ढह जाता है और जेम्स गहरे सदमे में चला जाता है। यह हादसा चरित्रों के माध्यम से आज के 'पॉलिटिकल कल्चर', उसकी संवेदनहीनता को उजागर करता है तथा चरित्रहीन राजनीति पर प्रहार करता है। इस हादसे की राजनैतिक हलके में तीखी भर्त्सना होती है किंतु कई स्वार्थी चेहरे उभरते हैं। वेन साय, उदित साय और हरेंज साय जैसे लोग अभिजात-संपन्नवर्ग के प्रतीक हैं। इसी समय विदेशी आक्रमणकारियों और विदेशों में पैदा हुए धर्म के दलालों से सतर्कता की बात होती है और अपने धर्म की रक्षा के लिए ताक़त के इस्तेमाल की भी। यहॉं बहुत से संदेह और डर उपजते हैं। दरअसल धर्म कम मृत्यु ज़्यादा डराती है। बम-विस्फोट किसी धर्म को नहीं जानता-पहचानता। यहॉं चर्च, पैलेस, हिंदू फ़ंडामेंडलिस्ट और तमाम राजनैतिक पार्टियॉं संदिग्ध हो जाती है।
सवाल ट्रीटमेंट का.................आग की लपटें......
....क्रमश: .............देखें.......... आख्यान - 2
आगमन और प्रस्थान के मध्य......................तनाव की काली नदी...
चरित्र व्यक्ति होते-होते रह जाते हैं जबकि व्यक्ति अक्सर चरित्र हो जाते हैं। जेम्स खाखा एक ऐसा ही व्यक्ति है जो तेजिंदर के यहॉं 'काला पादरी' के चरित्र में परिणत हुआ है। जेम्स खाखा के होने को पुरजोर और संभव बनाता है आदित्य पाल । आदित्य वह चेहरा है जिसके अभाव में इस कथा के सारे चेहरे बेचेहरा हो जाते, एक सहायक चरित्र के रूप में आदित्य ने इस कथा के मुख्य चरित्र को गौण होने से बचाया है। वह एक कर्मचारी है जो भोपाल से स्थानांतरित होकर अम्बिकापुर आता है और अम्बिकापुर से नागपुर स्थानांतरित होकर भोपाल जाता है। उसके आगमन और प्रस्थान के मध्य ही पूरा उपन्यास लगभग यथार्थ से परिघटित होता है। वह कथा-क्षेत्र के भूगोल से धीरे-धीरे वाकिफ़ होता है और जेम्स को जीवन के भूगोल से वाकिफ़ कराता है। दरअसल वही मथता है जेम्स को या जेम्स के इर्द-गिर्द उपस्थित उन सारे लोगों को जिनका सीधा संबंध है आस्था के रूपांतरण से। आदित्य को कथाविवेचन के शास्त्रीय आधार पर हम एक 'सूत्रधार' कह सकते हैं और मौजूदा राजनैतिक दौर की वैधानिक भाषा में एक चश्मदीद गवाह । वह पूरी तरह सफल होता है अवस्थितियों को खंगालकर समय के निक्षेप तक पहुँचने में। उसके अलावा और कौन कह सकता जेम्स से...''तुम्हारा यह सरगुजा, लोकतंत्र का सबसे सस्ता सामंतवादी संस्करण है,'' (पृ0 16) दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सुदूर जंगली इलाके में ,सघन जनजातीय क्षेत्र में, कहॉं तक व्याप्त है तंत्र का लोकरूप ? यह सोचनीय है। आदित्य की यह बात जेम्स के चेहरे पर 'तनाव की काली नदी' उपस्थित कर देती है, जिसमें जेम्स डूबने को विवश हो जाता है, किंतु आगे की कई घटना-परिघटनाओं में जेम्स का आत्मबोध-आत्ममंथन और जन्मजात सांस्कृतिक आग्रह उसके चरित्र को दृढ़ बनाते हैं।
अतीत - वर्तमान और भविष्य को लेकर जेम्स अपनी परिणति के स्वीकार में लगातार जूझता रहता है। उसका बुद्धि-कौशल, तार्किकता व सत्ता और धर्म की आधुनिक चिंतनशीलता उसे रवींद्रनाथ टैगोर के चरित्र 'गोरा' के काफ़ी निकट ले जाती है किंतु एक बड़ा फ़र्क़ है तीव्रता का। 'गोरा' के ज़हन में आवेग की महती भूमिका है जो धर्म-दर्शन और राजनीति की तार्किकता के साथ गोरा की कार्यप्रणाली को निष्पादित करता है जबकि जेम्स में बौद्धिकता के साथ भावुकता अपने पूरे दम-खम के साथ आकर, जेम्स की कार्यप्रणाली को शिथिलता प्रदान करती है। वैसे यह चरित्रगत बदलाव समय के बदलाव की ही वजह है।
पॉलिटिकल अंडरटोन्स.........................इट्स पार्ट ऑफ़ गेम फ़ॉर देम...
राय साहब सामंत का प्रतिनिधि बनकर उपस्थित होता है। उसके अपने रंग-ढंग हैं अपना ढब और हस्तक्षेप भी। राय साहब के लिए मंत्री भी एक पुर्जा है। करमसाय एक ऐसा ही मंत्री है जो राय साहब के लिए सरकारी सुविधा मुहैया करता है। अवांछित लोगों के द्वारा सरकार या तंत्र का उपभोग सत्ता के दब्बूपन को उजागर करता है। आदित्य व्यवस्था की विसंगति के विरोध का अभाव स्पष्ट महसूस करता है... ''मैं जब अपने इर्द-गिर्द देखता तो मुझे लगता कि ये सारे लोग जिनमें मैं भी शामिल हूँ, उन्हीं लोगों से मान्यता प्राप्त करने की होड़ में लगे हैं, जिनका अपने अंतर्मन से विरोध करते हैं। हम उसी व्यवस्था का संरक्षण चाहते हैं, जिसके विरोध में बड़ी-बड़ी बातें करते हैं । ऐसा शायद हम इसलिए करते हैं कि हम अपना नैतिक साहस कहीं न कहीं खो चुके होते हैं।'' (पृ0 16) यहॉं आदित्य के ज़रिए मनुष्य के नागरिक होने के उपरांत की पतनशीलता मुखर होती है। इस तरह अनेकानेक मानवीय आधारों के पतन से भूख मूर्त होती जाती है। जेम्स और आदित्य के आसपास बिखरी और पसरी भूख्ा उन्हें सोचने के लिए बाध्य करती है, वे चिंतित भी होते हैं किंतु चिंतन और विचारों में भटकने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। आदित्य जब बीजाकुरा गॉंव में भूख से मृत्यु संबंधी समाचारों को पढ़ता है तब भूख के आकार की खोज शुरू करता है किंतु सिहर जाता है। 'भूख से मृत्यु, दुनिया की भयावह कल्पना के रूप में उभरती है' जिसकी सच्चाई जानने के लिए वह जीवन के गहरे तक उतरता है। आदित्य और जेम्स दोनों गॉंधीवाद की छानबीन करते हैं। उनके ईस यत्न में गॉंधी की महत्ता और वर्तमान में उनके विचारों की प्रासंगिकता को समझने की कोशिश स्पष्ट झलकती है। यहॉं फासिस्ट हिंदुवाद को गॉंधीवाद से ख़तरा और गॉंधीवाद का राजनैतिक इस्तेमाल भी उजागर होता है। जेम्स और आदित्य अपनी ज़िरह में इस तह तक जाने की कोशिश करते हैं कि गॉंधी ने सचमुच अछूतों के लिए कुछ किया या उनका राजनैतिक इस्तेमाल किया। इस ज़िरह के नतीजे नज़रिये के हिसाब से अलग-अलग हो सकते हैं किंतु महत्वपूर्ण बात यह है कि यह संदर्भ 'सबाल्टर्न' का है, वही जो भूख, दरिद्रता और विधर्म की चपेट में है। आदित्य बार-बार जेम्स के मन-मस्तिष्क को खोदता है 'भूख के प्रति चर्च का रवैया' जानना चाहता है। जेम्स उससे कहता है... ''वह तो पॉलिटिकल अंडरटोन्स पर र्निभर करता है,'' (पृ0 25) यह चर्च के राजनैतिक प्रयोजन की स्पष्टोक्ति है। इसी तरह यह ज़िरह आगे राय साहब ,चर्च, पैलेस और हिंदुवादी सरकार की विकृति को उभारती है। ये सभी 'भूख से मौत' के लिए कुछ कारगर नहीं करते और एकदूसरे का मुँह देखते हैं, इनके अपने-अपने स्वार्थ हैं। अक्सर ऐसा होता है शक्तियों (समर्थों) की अंतर्कलह में सामान्यजन पिसता है। भूख्ा के मूर्तन आदित्य जिस आकार की तलाश करता है उसे जेम्स उसके सम्मुख 'बिरई लकड़ा' की मौत के बहाने सजीव उपस्थित कर देता है और साथ्ा ही यह भी स्थापित करता है कि ग़रीबी या दरिद्रता संपन्न (शक्तिसंपन्न) लोगों के खेल का एक हिस्सा है। जेम्स बार-बार मौजूदा राजनीति में विचारधारा को खंगालता है। वह सोचते हुए महसूस करता है कि घृणा ने हमें ग्रस लिया है।
काला यूरोप.....काली मेम........अमूर्त आकृतियॉं....
जेम्स की सारी चेष्टाऍं मानवीय हैं। वह अनुरक्त है। सोज़ेलिन मिंज उसके आसक्ति के दरक को जान जाती है, वह उसके भीतर दरकती आस्था और विश्वास को देख लेती है। ''सरगुजा एक तरह से काला यूरोप है और तुम काली मेम साहब'' जेम्स का सोज़ेलिन के प्रति यह कथन जेम्स की वाँछा के भैतिक पक्ष का उद्धाटन है। यूरोप, जो कि हमारी संस्कृति का विलोम है, वह उसे सरगुजा में महसूसना चाहता है, तमाम कालिख के बावजूद --यही कालिख संभव बनाती है काली मेम साहब के भोग के स्फूरण को। जेम्स के भीतर बहुत भटकन है। वह सोज़ेलिन में अपना घर तलाशता है। सोज़लिन इस कथा में समय की एक खरोंच है जो दीवारों पर अपने नाख़ून से अमूर्त आकृतियॉं गढ़ती है। वह जेम्स की भटकन से वाकिफ़ है किंतु अपनी प्रतीति के साथ वह स्वयं भी उन्मुक्त है... ''उसने जेम्स को थोड़ी देर के वास्ते इस बात के लिए अभिशप्त कर दिया कि वह उसे मरूस्थल के किसी कुऍं की तरह स्वीकार कर ले। अब रेत के कुओं में मुंडेर तो होती नहीं, और अगर होती भी हो तो उसका कोई पता ठिकाना तो उसने जेम्स को बताया नहीं था। वह एक अंधे कुऍं की तरह थी जिसमें जेम्स उतर रहा था। वह पूरी तरह उसकी गिरफ़्त में था।'' (पृ0 32) क्या यह रूमानियत है? हो न हो किंतु यह राग का प्रकृतिस्थ रूप है जो सुंदर से सुंदरतम की सृष्टि करता हुआ रचता है मनुष्य को। सोज़ेलिन जेम्स के स्पर्श को नहीं नकारती, वह जानती है पूर्वनिर्मित आकृतियों को अपनी इच्छानुसार ढालने की मुश्किलें और वह सफल भी होती है खिलखिलाकर हँसने में या हँसी की खिलखिलाहट को सहेज पाने में।
इट वाज़ ए वार ऑफ़ इमेजेज़.........यू रादर टेम्ड अस...
जेम्स और आदित्य की सोहबत ख़ास मायने रखती है। वे एक दूसरे के ज़रिए अपनी वैचारिकता को मथते हैं। फ़ादर मैथ्यूज़ से मुलाकात के दौरान जेम्स अपनी अतीत पीढ़ी की बात करके अपनी आस्था के मूल में जाना चाहता है जबकि आदित्य के भीतर बैठा अख़बारनवीस फ़ादर को खोद-खोदकर भूख और धर्मांतरण की परतें खोलना चाहता है। फ़ादर बार-बार सारी कारगुजारियों को प्रभु की इच्छा पर थोपकर स्वश्यं को और मिशनरीज़ को निर्दोष बताने का यत्न करता है। जेम्स के पूर्वजों के धर्मांतरण पर वह आदित्य की जिज्ञासा को शांत करने के लिए कहता है.....''इनके पास ईश्वर का कोई इमेज़ नहीं था डियर, जिसकी ओर ये आस भरी निग़ाह के साथ देख सके, जब हम यहॉं आया तो राजा भी अपना देवी को प्लांट कर रहा था। यू नो हाऊ टू प्लांट ए थाट, इट इज़ वेरी इंपार्टेंट, हमने भी प्रभु यीशु की इमेज़ प्लांट कर दी, इट वाज़ ए वार ऑफ़ इमेजेज़, जिसमें जीत हमारी हुई,'' (पृ0 44-45) करोडो देवी-देवताओं की आस्था वाले देश में फ़ादर का यह कथन हास्यास्पद है। आदिवासी शांषित होते रहे हैं,धर्मांतरण के पूर्व राजा(सामंत-जमींदार) और धर्मांतरण के बाद थोपी गई आस्था के द्वारा। फा़दर का यह कथन जेम्स के पूर्वजों को ईश्वर विहीन साबित कर रहा है। 'इट वाज़ ए वार ऑफ़ इमेजेज़' यह एक साम्राज्यवादी तर्क है।यहॉं साम्राज्यवाद धर्म को अस्त्र के रूप में इस्तेमाल कर हावी हुआ है। दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाला आदिवासी ईश्वर विहीन नहीं हो सकता क्योंकि उनकी अपनी निजी संस्कृति होती/रही है। आदित्य और फ़ादर की इस बातचीत का जेम्स पर गहरा असर होता है, वह आवेशित होता है ओर फ़ादर की अनुमति लेकर वह भी फ़ादर से सवाल करता है.....''क्या यह सच नहीं कि हमारी इमेजेज़ में पहाड़ थे, नदिया थीं, पेड़ थे,शेर थे , चीते थे, और राजा ने हमें बंधुआ बना दिया, फिज़िकली और इक्नॉमिकली एक्सप्लायट किया, लेकिन आपने क्या ? यू रादर टेम्ड अस, आपने हमें पालतू बना दिया, हमारे लिए हिंदू फंडामेंडलिस्टों और आपमें अब कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं है। हमारी सारी इमेजेज़ छीन ली आप लोगों ने.......''(पृ0 45) जेम्स का आक्रोश लाजिमी है। सच्चाई यहॉं अपने कड़वेपन की बजाय तीखे तेवर लेकर उजागर हुई है। यह जेम्स के चरित्र का अहम हिस्सा है जो उसके भीतर के हाहाकार को प्रकट करता है,दरअसल जेम्स किसी भी वजह से बौना नहीं होना चाहता, वह जीना चाहता है अपने वर्तमान में--अपने पूरे आत्मसम्मान के साथ,वह मुक्त होना चाहता है अतीत की उन परछाइयों से जिसमें राजा दुर्जन साल के वंशज और वहशी लुटेरे हैं, अपमान, ज़िल्लत और ग़ैर संवेदनशीलता से भरा एक गटर है। आत्मसम्मान के साथ जीने की चाह ही जेम्स को अपनी मॉं से असहमति की ओर ले जाती है। मॉं का यह विचार कि वे (जेम्स और उसकी बहन अनस्तासिया) अपना पूरा जीवन चर्च की सेवा में बिताऍं, एक तरह का बंधुआ विचार है। 'विचारों का बंधुआ होना'-- इस तरह से किसी चरित्र के द्वारा हिंदी में शायद पहली बार सोचा गया है। जेम्स के भीतर हाहाकार बढ़ता ही जाता है। उसका अस्तित्वबोध एक बात स्पष्ट कर देता है कि धर्मांतरण--जो भूख मिटाने का कारगर तरीका था वही ईश्वर थोप देता है--विवश कर देता है। थोपे गए ईश्वर और विवशता में जीना बंधुआ जीवन है। जेम्स का अंतर्द्वंद्व जेम्स को निखारता है। ईश्वर या गॉड से उसका कोई झगडा़ नहीं है वह तो उन लोगों पर खफ़ा है जिन्होंने उसके पुरखों से सांस्कृतिक स्वायत्तता छिनी, प्रकारांतर से उसे संस्कारों का अभाव खलता है क्योंकि वह ईसा के सलीब की तरह मिशनरीज़ द्वारा थोपे गए जीवन को ढो रहा है।
सोज़ेलिन मिंज काफ़ी दूर तक जेम्स की हमक़दम है किंतु वह अपनी 'निजता' बचाए हुए है ।उसके भीतर कोई ज़िरह नहीं है या हो भी तो वह प्रकट नहीं हो पाती । धर्मांतरण-- अपनी निजता खोना है।
'सोना रूपा तुरू झबराकस डरणखस.............जिना पानी एदआ चिआ'...
ब्रदर हरपाल आस्था के अंधेपन, ढोंग को मुखर करता है। वह कर्महीनता या अकर्मण्यता व मक्कारी का पोषक है। आदित्य ब्रदर हरपाल को भी टटोलकर बाहर निकालने में सफल होता है।
भटहरा गॉंव में उपस्थित दृश्य जेम्स और आदित्य को प्रभावित कर जाता है। वह बैगा जिसके हाथ में झाड़ू है और जो एक भूख-पीड़ित के उद्धार के उपक्रम में लगा हुआ है, अंधविश्वास का शासक है। आदिवासी समाज में व्याप्त अंधविश्वास यहॉं जीवंत रूप में प्रस्तुत हुआ है। भूखपीड़ित इस दृश्य को और भयावह बना रहा है.... ''वह आदमी जब अपना मुँह खोलता है तो उसका मुँह किसी गुफा की तरह नज़र आता है और लगता है कि वह आसपास खड़े सभी लोगों को निगल जाएगा'' (पृ0 71) वह व्यक्ति आख़िर मर जाता है। बैगा उसकी मृत्यु पर भी अंधविश्वास गढ़ता जाता है। यहॉं लेखक ने 'टेबू' या संस्कृति-भाषा (पबलावर, डुबल, पासल, टांगल, जैसे शब्द ) का उपयोग किया है तथा 'टोटेम' (धर्मप्रतीक) का सहारा लिया है। ''सोना रूपा तुरू झबराकस डरणखस'' और ''जिना पानी एदआ चिआ'' जैसे भाषायी प्रयोग किसी आदिम मिथक की ओर संकेत करते हैं।
धुऑं.....व्हाट इज़ बीयांड स्मोक,..............पॉलिटिकल कल्चर...
जेम्स खाखा के लिए 'राजा' शब्द का विशेष महत्व है। उसके अतीत से सरगुजा के वर्तमान तक और बाइबिल में वर्णित राजा की भूमिका उसे आक्रोश और उदासी से भर देती है। ऐसे समय में वह बिशप स्वामी के पास जाता है, उसका उद्वेलन बना रहता है। वह देखता है कि बिशपस्वामी के दो रूप है एक वह जो सारी जिज्ञासाओं को शांत करता है, दूसरा वह जो बेगाना है, रोमदूत है।
जेम्स दीवारों पर 'गर्व से कहो हम हिन्दू हैं' और 'यहॉं रहना है तो हिन्दू बनकर रहना होगा', जैसी इबारतें पढ़कर सहम जाता है। उसकी भीरूता धर्म-विश्वास की भीरूता है। अपने सामने गुज़र रही जीप, सिर पर कपड़ा बॉंधे और जय बजरंगबली' जैसे कुछ नारे लगा रहे युवकों से उसे ''क्यों बे चिरई...' जैसा उपहासास्पद संबोधन सुनाई पड़ता है साथ ही यह उलाहना ....''चल रे पादरी, मंदिर में तोहे शिवजी बुलाये हैं।'' ये युवक कौन है? इसकी निश्चित पहचान नहीं है किंतु यह तय है कि यह धर्म का उग्र चेहरा है, एक उन्माद है जिसे वह यौवन ढो रहा है जो दिशाहीन है। इसी समय चर्च में एक धमाका होता है, चर्च की दीवार का एक हिस्सा ढह जाता है और जेम्स गहरे सदमे में चला जाता है। यह हादसा चरित्रों के माध्यम से आज के 'पॉलिटिकल कल्चर', उसकी संवेदनहीनता को उजागर करता है तथा चरित्रहीन राजनीति पर प्रहार करता है। इस हादसे की राजनैतिक हलके में तीखी भर्त्सना होती है किंतु कई स्वार्थी चेहरे उभरते हैं। वेन साय, उदित साय और हरेंज साय जैसे लोग अभिजात-संपन्नवर्ग के प्रतीक हैं। इसी समय विदेशी आक्रमणकारियों और विदेशों में पैदा हुए धर्म के दलालों से सतर्कता की बात होती है और अपने धर्म की रक्षा के लिए ताक़त के इस्तेमाल की भी। यहॉं बहुत से संदेह और डर उपजते हैं। दरअसल धर्म कम मृत्यु ज़्यादा डराती है। बम-विस्फोट किसी धर्म को नहीं जानता-पहचानता। यहॉं चर्च, पैलेस, हिंदू फ़ंडामेंडलिस्ट और तमाम राजनैतिक पार्टियॉं संदिग्ध हो जाती है।
सवाल ट्रीटमेंट का.................आग की लपटें......
....क्रमश: .............देखें.......... आख्यान - 2
शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010
इंसां को इंसां से........
इंसां को इंसां से बैर नहीं है
फिर भी इंसां की ख़ैर नहीं है
ये क़ातिल जुल्मी औ' डाकू लुटेरे
अपने ही हैं सब ग़ैर नहीं हैं
अच्छाई की राहें हैं हज़ारों
उन पर चलने वाले पैर नहीं हैं
दूर बहुत दूर होती हैं मंजिलें अक्सर
लंबा सफ़र है यह कोई सैर नहीं है
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