रविवार, 28 अक्तूबर 2012

क़त्‍ल के बाद


गि‍लास भर पानी की तरह 
पी जाता हूँ अपनी नींद को 

आँखें जैसे खाली गि‍लास 

देखता हूँ, एक कमरे की 
रोशनी से बाहर का अँधेरा 

दूर-दूर तक अँधेरा 

अँधेरे में सोया हे जग सारा 
खोया-खोया-सा 
अपने सुख-चैन में 
मुग्‍ध-तृप्‍त 

भीतर टटोलता हूँ अपने
 कुछ मि‍लता नहीं ! 
कमरा भर रोशनी के क़त्‍ल के बाद 
अपने भीतर 
पाता हूँ बहुत-सी चीज़ें
अँधेरे में साफ़-साफ़ 
                                            -2001 ई0 

        ०००००
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