गुरुवार, 25 नवंबर 2010

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं

ग़ज़ल 

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, 
होते हैं और नहीं भी होते हैं। 

सब ढोंग-धतूरे अपने ही मूल्‍क में नहीं, 
अच्‍छे-बुरे लोग हर कहीं होते हैं। 

बेकार पूजते हैं हम अपनी इच्‍छाओं को, 
सब कुछ  पा लेने वाले भी ख़ुश नहीं होते हैं। 

हरे-भरे सपने से जुदा है रोज़गार, 
नहरें खोदने वाले सभी प्‍यासे नहीं होते हैं। 

जि‍से जो समझना था समझा है ख़ुद को, 
सारे ग़लत लोग कभी सही भी होते हैं। 

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