मंगलवार, 24 अगस्त 2010

नुसरत की ऑंखें

नुसरत की आंखें 


समझ नहीं  आता  
वार करती हैं / या प्‍यार करती हैं
 फिर भी बहुत अच्‍छी हैं
नुसरत की आंखें


राह देख चलती हैं इनसे
जल्‍द भांप लेती है खतरा
भीतर तक झांक लेती है अक्‍सर
सबको टोहती रहती
लेकिन
उसको खुलके  बिखरने नहीं देतीं
नुसरत की आंखें


बकरियों की तरह फिरती
जाने कहां कहां दीख जाती
हंसी चुहल से बलखाती
कमसिन  नादां
भरी दुपहरी जेठ की
परछाइ को रौंदती 'जाती है कहां '
 अक्‍सर पूछती हैं
मछली सी तडपती
नुसरत की आंखें  


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