शुक्रवार, 7 मार्च 2014

अंकित हैं तुम्हारी पगध्वनियाँ



मेरी नींद में अंकित हैं तुम्हारी पगध्वनियाँ
यह सत्य नहीं तो कुछ अंश तो है सच का
मैं देख सकता हूँ तुम्हें अपने अवचेतन एकांत में
मुग़ालते से बचने के लिए चेत जाता हूँ
तुम्हारे गुनगुनाने और थिरकने से कहीं ज्यादा
मेरी साँसों में हैं गुज़रनेवाली हवा का उधम
यह तब जाना जब तुम थक चुकी
मैं तंग आ गया हूँ अपनी रफ़्तार से
कि इतना तेज़ क्योंकर है मेरा दौड़ पड़ना
तुम्हारी ओर समय की तरह
तुमने कभी कुछ कहा क्यों नहीं !

चोट हल्की होती है तुम्हारे पत्थर होने पर मेरे पाँवों में ठेस की
दर्द भी हल्का-हल्का होता है
सिसकियाँ भी नहीं, सुबकना भी नहीं
फिर कौन तड़पता है मेरे भीतर
समझाती हो किसे सबकुछ सहकर चुप रहने के लिए

अक्सर मेरे सिरहाने पड़ी रहती है सपनों की थैली
पाँवों में कसी होती है जल्दी टूट जानेवाली रस्सियाँ
हाथ हवा को टटोलते हैं किसी आकार का भ्रम लिए
कोई रंग आँखों में चला जाता है यकसाँ
हरबार की तरह अपना उन्माद लिए
ख़ुश्‍बुएँ मेरे नथूनों में घूसकर उकसाती हैं
तुम ही तो नहीं जो वक़्त को फुसलाती रहती है मेरे सामने
                                दीवार होने के लिए

तुमने कहाँ छिपा रखा है अपना चेहरा
कि खिलखिलाहट तो है पर
मुसकान सी कोई
फुसफुसाहट नहीं है
चुभती हैं तुम्हारी पलकें मेरी आँखों में
जादू-सा उतरता है तुम्हारा राग मेरे भीतर कहीं
बजता है एक सितार दूर बहुत दूर
अपने ग़ुम हो जाने के ख़याल में
अभी तुम्हारे अनंग का विस्तार
कहीं सजता होगा
सोचूँ भी तो ऐसा  क्यों
कि धड़ाम से गिर पड़े मेरे भीतर कोई
आत्मा के आराम का
समय तय करेंगी धुन कोई
तुम्हारा रव कोई
तुम्हारा नृत्य कोई
तुम्हारा राग कोई
कि चुपके से मिटा न दो कहीं
अपने पाँवों के निशाँ
अपना पत्थर होना
मेरे लिए है अपने पारावार से गुज़रना 

                              - 2002 ई0

            *** 

बुधवार, 23 जनवरी 2013

कोई नहीं है

बंद दरवाज़ा
लौटा देता है वापस , 
राह अपनी

थकान, दुनी 
हो जाती है जाने से 
आने की 

रास्‍ता 
पहचानने लगा है 

हर मोड़ कुछ 
सीधा हो जाता है 
सहानुभूति‍ में 

कभी भूल से साँकल 
खटखटाने पर  
झूम उठता है ताला 
खि‍लखि‍लाकर बताता हुआ, 
''कोई नहीं है । '' 
                                     १९९८ ई० 
       *** 


मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

...आसमानों की परवाज़ कर


चल  उठ  एक  नई  ज़िंदगी  का  आगाज़  कर,
पेट खाली ही सही आसमानों की परवाज़ कर ।


मान    भी    ले    अब   यह   ज़ि‍द   अच्‍छी   नहीं,
''मि‍ल गया 'यूटोपि‍या' का रास्‍ता'' ये आवाज़ कर ।


लबों पे आने मत दे नाम तख्‍तो-ताज का,
बस   उसको   दुआ   दे,   'जा  राज  कर । 


लाख  करे  कोई  उजालों की बात, बहक मत, 
तू फ़क़त ज़िंदा रह और ज़िंदगी पे नाज कर ।
                                                              १९९५  ई०

                        ०००००

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

और कुछ न था


कल जहाँ 
हमने तय की थीं दि‍शाएँ 
अपने-अपने रास्‍तों की  

वहाँ, 
जल में तैरती हुई स्‍मृति‍याँ थीं 
और कुछ न था 

स्‍मृति‍यों में 
फड़फड़ाती हुई मछलि‍याँ थीं 
और कुछ न था 

मछलि‍यों में 
भड़कती हुई तृषा थीं 
और कुछ न था 

तृषा में 
कि‍लोले करते हुए मृग थे 
और कुछ न था 

मृगों में 
मैं था, तुम थी, सारा संसार था 
और कुछ न था 
                                - 1999 ई०
        ००० 


रविवार, 28 अक्तूबर 2012

क़त्‍ल के बाद


गि‍लास भर पानी की तरह 
पी जाता हूँ अपनी नींद को 

आँखें जैसे खाली गि‍लास 

देखता हूँ, एक कमरे की 
रोशनी से बाहर का अँधेरा 

दूर-दूर तक अँधेरा 

अँधेरे में सोया हे जग सारा 
खोया-खोया-सा 
अपने सुख-चैन में 
मुग्‍ध-तृप्‍त 

भीतर टटोलता हूँ अपने
 कुछ मि‍लता नहीं ! 
कमरा भर रोशनी के क़त्‍ल के बाद 
अपने भीतर 
पाता हूँ बहुत-सी चीज़ें
अँधेरे में साफ़-साफ़ 
                                            -2001 ई0 

        ०००००
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