बुधवार, 11 अप्रैल 2012

फि‍र


थकान के बि‍स्‍तर पर बेसुध नींद 
मूर्छा की हद तक 
कभी-कभी मौत की तरह 
बेहद शांत और थि‍र 
                       फि‍र 
एक चुटकी सुबह की 
और मुसकाती धूप 
            पुचकारती नई लंबी यात्रा के लिए 
                  बहलाती-सी कि‍सी बच्‍चे की तरह 
समझा चुकी होती पूरी तरह एक नया काम 

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4 टिप्‍पणियां:

Trupti Indraneel ने कहा…

बस यही है जिंदगी ....
बहुत सुन्दर भाव !

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बहुत खूब सर!


सादर
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‘जो मेरा मन कहे’ पर आपका स्वागत है

यशवन्त माथुर ने कहा…

कल 20/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

सुमन कपूर 'मीत' ने कहा…

जिंदगी की कहानी यही है ..

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