मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

...आसमानों की परवाज़ कर


चल  उठ  एक  नई  ज़िंदगी  का  आगाज़  कर,
पेट खाली ही सही आसमानों की परवाज़ कर ।


मान    भी    ले    अब   यह   ज़ि‍द   अच्‍छी   नहीं,
''मि‍ल गया 'यूटोपि‍या' का रास्‍ता'' ये आवाज़ कर ।


लबों पे आने मत दे नाम तख्‍तो-ताज का,
बस   उसको   दुआ   दे,   'जा  राज  कर । 


लाख  करे  कोई  उजालों की बात, बहक मत, 
तू फ़क़त ज़िंदा रह और ज़िंदगी पे नाज कर ।
                                                              १९९५  ई०

                        ०००००

2 टिप्‍पणियां:

मैं और मेरा परिवेश ने कहा…

भीड़ से हटकर अपनी धुन पर चलती कविता

Shikha Gupta ने कहा…

बहुत अलग मिजाज़ की रचना .....बहुत खूब
अपना पता छोड़ रही हूँ ..कृपया नजर डालें ...
http://shikhagupta83.blogspot.in/

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