मंगलवार, 27 नवंबर 2012

और कुछ न था


कल जहाँ 
हमने तय की थीं दि‍शाएँ 
अपने-अपने रास्‍तों की  

वहाँ, 
जल में तैरती हुई स्‍मृति‍याँ थीं 
और कुछ न था 

स्‍मृति‍यों में 
फड़फड़ाती हुई मछलि‍याँ थीं 
और कुछ न था 

मछलि‍यों में 
भड़कती हुई तृषा थीं 
और कुछ न था 

तृषा में 
कि‍लोले करते हुए मृग थे 
और कुछ न था 

मृगों में 
मैं था, तुम थी, सारा संसार था 
और कुछ न था 
                                - 1999 ई०
        ००० 


1 टिप्पणी:

ओमी ने कहा…

बहुत खूब

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